सोने की बढ़ती चमक

सन्दर्भ

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता देश है और अपनी लगभग पूरी स्वर्ण माँग आयात के जरिए पूरी करता है। ऐसे में सोने के आयात में कमी अर्थव्यवस्था के लिए लाभप्रद है। आर्थिक सुस्ती के वर्तमान दौर में सोने के आयात में कमी से व्यापार घाटे में भी कमी आएगी। निश्चित रूप से भारत जैसे विकासशील देश के लिए सोने में निवेश उत्पादक नहीं है। प्रतिवर्ष देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का करीब तीन फीसद सोने की खरीद के रूप में अनुत्पादक पूँजी में बदल रहा है।

आयात में कमी

यकीनन वर्ष 2019 की शुरुआत से ही देश में सोने का आयात कम होने का परिदृश्य दिखाई दे रहा है। आमतौर पर देश में दीवाली जैसे त्योहार की तैयारी के मौसम में सोने की माँग तेजी से बढ़ती है और भारत का स्वर्ण आयात बढ़ जाता है। लेकिन इस वर्ष ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है। यदि हम आँकड़ों की तरफ देखें तो पाते हैं कि सोने का आयात तीन वर्ष के निचले स्तर पर आ गया है। पिछले महीने भारत ने छब्बीस टन सोने का आयात किया था, जो एक साल पहले के 81.71 टन से कम है। ऐसे में चालू महीने यानी अक्तूबर में सोने की माँग में कितनी भी वृद्धि हो जाए, इसका आयात पचास टन से कम रहने के आसार हैं।

कीमतों में वृद्धि

इस समय देश और दुनिया में सोने की कीमतें आसमान छू रही हैं। बड़े निवेशक सोने में निवेश करके भारी लाभ कमा रहे हैं। हालांकि देश और दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में नरमी और गिरावट का दौर चल रहा है। प्रॉपर्टी बाजार ठंडा पड़ा है। शेयर बाजार भी कभी उतरते हुए तो कभी चढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। लेकिन सोना उन गिनी-चुनी परिसंपत्तियों में है जो छोटे-बड़े सभी निवेशकों के लिए सुरक्षित और आकर्षक लग रहा है। विशेषज्ञ यह स्वीकार करते हैं कि शेयर, रीयल एस्टेट और सोना लंबी अवधि में सबसे अधिक प्रतिफल देने वाली परिसंपत्तियां होती हैं। इसलिए विशेषज्ञ पिछले कुछ वर्षों के दौरान सोने का प्रदर्शन कमजोर रहने के बावजूद निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में इस पीली धातु की हिस्सेदारी बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं।

सोने की चमक फीकी पड़ी

भारत में निवेश के चार बड़े साधन माने जाते रहे हैं। सोना, संपत्ति, शेयर और बचत योजनाएं। बीते वर्षों में विशेष रूप से वर्ष 2013 के बाद सोने की चमक फीकी पड़ी है। उस समय सरकार ने शुल्क बढ़ा कर और आयात पर अंकुश लगा कर खरीदारी को हतोत्साहित किया था, जिससे सोना अपने सबसे ऊँचे स्तर से लुढ़कने लगा था। उस अवधि में शेयरों ने अच्छा प्रदर्शन किया। रीयल एस्टेट भी एक अन्य महत्त्वपूर्ण परिसंपत्ति वर्ग है, लेकिन यह बहुत से नियमों, करों और परिसंपत्ति को बेचना आसान नहीं होने के कारण कमजोर बना हुआ है। इसके अलावा रीयल एस्टेट के लंबी अवधि के प्रतिफल के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं और न ही यह प्रतिफल पूरे देश में एकसमान है। करीब चार दशक से सूचकांक के आँकड़े उपलब्ध हैं और इस दौरान शेयरों ने अच्छा प्रतिफल दिया है। पिछले एक दशक में सोने का प्रतिफल शेयरों से अधिक रहा है। ऐसा लगता है कि भारत में सोना अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचने और हाल में निवेश पोर्टफोलियो में सोने का हिस्सा बढ़ाने की चर्चाओं से परिदृश्य बदल रहा है। इस पीली धातु में अन्य संपत्ति वर्गों की तुलना में कई खूबियां हैं। सोने में अन्य वित्तीय बाजारों, विशेष रूप से शेयरों की तुलना में अलग रुझान होता है। निवेशकों को सोना खरीदने के लिए प्रोत्साहित करने वाले कारक भी अलग होते हैं। भारत में सोना परिवारों की जरूरत है और सोने के आभूषण पहनना भारतीय संस्कृति का अंग भी है। लोग धार्मिक आस्था की वजह से मंदिरों में सोना चढ़ाते हैं।

यदि हम देश में सोने की बढ़ती हुई कीमतों और सोने में निवेश करने वाले निवेशकों का ग्राफ देखें, तो पाते हैं कि चालू वित्त वर्ष 2019-20 के पहले पाँच महीनों यानी अप्रैल से सितंबर के बीच देश में सोना निवेशकों को 22 प्रतिशत से अधिक का लाभ दे चुका है। जबकि पिछले पूरे वित्तीय वर्ष 2018-19 में सोने के निवेशकों को लगभग दस प्रतिशत का लाभ मिला था। इस महीने में अब तक देश में सोने की कीमतें 6 साल की सर्वोच्च ऊँचाई पर पहुँच चुकी हैं। अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि इस साल के अंत तक सोना 42 हजार प्रति दस ग्राम तक पहुँच सकता है।

कीमतें बढ़ने के कारण

इस समय दुनिया में सोने की कीमतें बढ़ने के कई कारण दिखाई दे रहे हैं। दुनिया के केंद्रीय बैंक डॉलर की तुलना में सोने को महत्त्व दे रहे हैं और वे सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं। इसके पीछे एक वजह अमेरिका और डॉलर की धमक कम करना भी है। रूस, चीन और भारत सहित दुनिया के कई देशों के केंद्रीय बैंकों ने पिछले कुछ महीनों में काफी मात्रा में सोना खरीदा है। छह सौ तेरह टन के सोने के भंडार के साथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस मामले में दसवां सबसे बड़ा सोने के भंडार वाला केंद्रीय बैंक है। सोने की कीमतों में नई तेजी की जड़ें दुनिया के कई विकसित देशों द्वारा डॉलर के नए विकल्प की तलाश में निहित हैं।

दुनिया में सोने की कीमत बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध भी है। इससे वैश्विक मंदी का माहौल बन गया है। ऐसे में निवेशक सोने की खरीदी को उपयुक्त मान रहे हैं। अमेरिका में ब्याज दरें घटने की संभावना से भी डॉलर कमजोर हुआ है और इससे सोने की चमक तेज हुई है। चीनी मुद्रा के अवमूल्यन से मुद्रा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भी सोने के दाम बढ़ाए हैं। सऊदी अरब की सबसे बड़ी तेल कंपनी पर आतंकी हमले के साथ खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव से भी सोना महंगा हुआ है। अमेरिका ने यूरोप के सामान पर शुल्क बढ़ाने का जो कदम उठाया, उससे भी सोने की चमक और बढ़ी। भारत में सोने की कीमत बढ़ने के दो अन्य कारण भी हैं। इनमें एक कारण इस साल के बजट में सोने पर सीमा शुल्क दस फीसद से बढ़ा कर साढ़े बारह फीसद कर दिया जाना है और दूसरा कारण मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले में रुपया कमजोर हुआ है।

स्वर्ण बॉन्ड में निवेश

हालांकि भारत में सोने के दाम अब तक के सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गए हैं, लेकिन नए सोने की माँग अधिक नहीं बढ़ी है। लोग भी सोना बेच कर मुनाफा बनाने में लगे हैं। सरकार को चाहिए कि सोने की खरीदारी के इच्छुक निवेशकों को सोने की खरीदी की तुलना में स्वर्ण बॉन्ड के विकल्प की ओर प्रवृत्त करने की कोशिश करे। गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों के अलावा सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड भी आ गए हैं और ये स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध हैं। इन दो विकल्पों ने पहले ही भौतिक रूप में सोना खरीदने की जरूरत खत्म कर दी है और इस पीली धातु को सही मायनों में ऐसा निवेश उत्पाद बना दिया है, जिसमें भौतिक सोने के साथ पैदा होने वाला भावनात्मक जुड़ाव आड़े नहीं आता है। स्वर्ण बॉन्ड में निवेश पर सरकार ने कई तरह की रियायतों की घोषणा की है, जिससे इसमें निवेश ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। इसके तहत एक ग्राम सोने के मूल्य के बराबर न्यूनतम बॉन्ड में निवेश कर सकते हैं। स्वर्ण बॉन्ड की बिक्री पर होने वाले लाभ पर किसी तरह का कर नहीं लगता है। ऐसा किया जाना सोने के निवेशकों के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी लाभप्रद होगा।