सीएबी-एनआरसी का लक्ष्य बांटो और जीतो

सन्दर्भ

सात दशकों से पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान एक ही राग अलाप रहा है : ‘कश्मीर विभाजन एक अधूरा मसला है। उसे हल करने के बाद भारत और पाकिस्तान मित्रवत रह सकते हैं। ठीक कनाडा और अमेरिका की तरह।’ भारत भी इसका जवाब एक ही सुर में देता आया है: ‘विभाजन अंतिम था और हो चुका है। कोई मूर्ख या आत्मघाती प्रतिशोधी ही उस घाव को दोबारा खोलना चाहेगा।’

विभाजन की चर्चा

अब भारत के हिस्से की पटकथा बदल रही है। बीते कई दिनों के दौरान हमने नागरिकता अधिनियम 1955 या नागरिकता संशोधन विधेयक, 2019 (CAB) के समर्थकों को विभाजन की बात करते सुना। वे अधूरा मसला जैसी बातें नहीं करते लेकिन वे पूर्ण न्याय, निपटारे तथा गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को न्याय की बात करते हैं। उनका कहना है कि सीएबी पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों से वादा निभाने का जरिया है। वह वादा क्या था, इस पर बहस हो सकती है। इसमें दो राय नहीं कि पहले पाकिस्तान की परिकल्पना की गई, उसके लिए लड़ाई लड़ी गई और उपमहाद्वीप के मुस्लिमों के लिए उसे घर के रूप में हासिल किया गया। परंतु इसका यह अर्थ नहीं था कि भारत उनका घर नहीं रहेगा।

नेहरू-लियाकत समझौता

यह भी सही है कि धार्मिक आधार पर एक बड़ी आबादी की अदला-बदली हुई। इस दौरान खूनखराबा और बलात्कार भी हुए। पश्चिमी इलाके में यह लेनदेन कुछ वर्षों में पूरा हो गया। भारतीय पंजाब में बहुत कम मुस्लिम और पाकिस्तानी पंजाब में बहुत कम हिंदू या सिख बचे। कुछ मामले सन 1960 के दशक के मध्य तक चले। मसलन क्रिकेटर आसिफ इकबाल जो पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान बने, वह सन 1961 में वहाँ गए। तब तक वह हैदराबाद की टीम से खेलते थे, जिसके कप्तान बाद में टाइगर पटौदी बने। सन 1965 की जंग के बाद लोगों की आवाजाही में क्षणिक तेजी आई और समाप्त हो गई।

परंतु पूर्व में मामला अलग था। इसकी कई जटिल वजह हैं। पूर्वी पाकिस्तान और भारत के पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में आबादी की अदला-बदली जल्दी समाप्त नहीं होने वाली थी। बंगाली मुस्लिम बड़ी तादाद में भारत में रह गए और पूर्वी बंगाल (पाकिस्तान) के हिंदू वहीं बने रहे। लेकिन दंगे और लोगों की यदाकदा आवाजाही चलती रही। सन 1950 में इसे रोकने के लिए तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसे नेहरू-लियाकत समझौता कहा जाता है। इस समझौते के पाँच अहम स्तंभ थे:

  1. दोनों देशों ने यह प्रतिबद्धता जताई कि वे न केवल अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे बल्कि उन्हें सरकारी नौकरी, राजनीति और सशस्त्र बलों में सभी अधिकार और आजादी देंगे।
  2. जो लोग दंगों के कारण अस्थायी रूप से विस्थापित हुए और अपने घर लौटना चाहते हैं उन्हें पूरी सुविधा और संरक्षण प्रदान किया जाएगा।
  3. जो अपने घर लौटना नहीं चाहते उन्हें किसी भी अन्य प्रवासी की तरह नागरिक स्वीकार किया जाएगा।
  4. इस बीच दोनों पक्षों में उन लोगों को पूरी आजादी होगी जो अभी भी दूसरी ओर जाना चाहते हैं। उन्हें पूरी सहायता और संरक्षण दिया जाएगा।
  5. दोनों पक्ष कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने के गंभीर प्रयास करेंगे ताकि लोग सुरक्षित महसूस करें।

राष्ट्रीय नागरिक पंजी

इसके बाद ही भारत ने सन 1951 में पहला (और अब तक अंतिम) राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) बनाया। CAB की बहस में हम अक्सर भाजपा नेताओं को नेहरू-लियाकत समझौते का जिक्र करते सुनते हैं। वे कहते हैं कि भारत ने अपनी प्रतिबद्धता निभाई लेकिन पाकिस्तान ने नहीं। इस पर बहस करना कठिन है। आबादी के आँकड़े बताते हैं कि भारत में मुस्लिमों की कुल आबादी बढ़ी है। यह बढ़ोतरी हिंदुओं और सिखों की वृद्धि दर से भी तेज रही है। जबकि पाकिस्तान वाले हिस्सों में अल्पसंख्यकों की आबादी तेजी से घटी। माना जा सकता है कि उन्होंने पाकिस्तान छोडऩा और भारत में बसना जारी रखा।

यही कारण है कि भाजपा सीएबी को विभाजन के अधूरे एजेंडे का जवाब बताती है। उसका कहना है कि पाकिस्तान ने नेहरू-लियाकत समझौते में अपना वादा नहीं निभाया और इसलिए भारत उन गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का स्वाभाविक घर बनता गया। उधर, इस्लामिक देशों में मुस्लिमों के प्रताडि़त महसूस करने की कोई वजह नहीं है।

धार्मिक आधार पर स्थानांतरण

यहाँ जटिलताओं की शुरुआत होती है: पहली बात, भारत के संस्थापक अपने धर्मनिरपेक्ष गणराज्य को जिन्ना का द्विराष्ट्र सिद्धांत की तरह ढालना नहीं चाहते थे। दूसरा, पुराना इतिहास किस बिंदु पर समाप्त होता है नया शुरू होता है? तीसरी बात यह कि क्या ‘राष्ट्रीय’ और ‘स्थानीय’ एक दूसरे के पर्याय हैं? क्या ‘धर्म’ को ‘जातीयता’ और ‘भाषा’ का पर्याय माना जा सकता है?

चूंकि हमने नये और पुराने इतिहास पर सवाल उठाए हैं तो हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम कुछ दशक पीछे जाकर पूर्वी इलाके, खासकर असम में हुए स्थानांतरण की प्रकृति और जटिलता को समझें। असम की आबादी घनी नहीं थी और वहाँ प्रचुर मात्रा में उर्वर जमीन और जल संसाधन मौजूद थे। इसके कारण 20वीं सदी के आरंभ में पूर्वी बंगाल से बड़ी तादाद में लोग यहाँ आकर बसे। इनमें से अधिकांश आर्थिक कारणों से जमीन और आजीविका की तलाश में आए। इसके लिए ‘घुसपैठ’ शब्द का पहला प्रयोग सन 1931 में असम के जनगणना कार्य के ब्रिटिश अधीक्षक सी एस मुल्लन ने किया था।

मुल्लन ने लिखा, ‘इस प्रांत में बीते 25 वर्षों की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना जो समूचे असम के भविष्य को हमेशा के लिए बदल सकती है और असमिया सभ्यता और संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर सकती है वह है जमीन के भूखे प्रवासियों की घुसपैठ, इनमें ज्यादातर पूर्वी बंगाल और खासकर मेमनसिंह से आए मुस्लिम।’ उन्होंने इसका भयानक चित्रण करते हुए लिखा, ‘जहाँ कंकाल पड़ा होगा वहाँ गिद्ध जुट जाएंगे और जहाँ कहीं भी खाली जमीन होगी वहाँ मेमनसिंह वाले एकत्रित हो जाएंगे।’ असम के लोगों की भाषाई और जातीय चिंता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है।

यदि असम में मुस्लिमों का आर्थिक देशांतर बहुत पहले मुद्दा बन गया था, वहीं विभाजन के बाद हिंदू भी इसमें शामिल हो गए। सन 1947 के पहले आए मुस्लिम यहीं टिक गए और इसके बाद प्रताडि़त हिंदुओं के झुंड के झुंड यहाँ आए और पूरे क्षेत्र का जातीय संतुलन बदल गया। यही समस्या का मूल है और इसके चलते ही सीएबी असम की चिंताओं का उत्तर देने मे नाकाम है। वहाँ असली चिंता धार्मिक नहीं बल्कि जातीय, सांस्कृतिक, भाषाई और राजनीतिक है। आरएसएस और भाजपा ने बीते तीन दशक में इसे बदलने का प्रयास किया है। मैंने इस बारे में लिखा भी है। ज्यादातर मुस्लिम प्रवासी पुराने और विभाजन के पहले के हैं, उन्हें नागरिकता से वंचित नहीं किया जा सकता। बंगाली हिंदू वहाँ सबसे नये हैं। यही कारण है कि जिन 19 लाख लोगों को एनआरसी में छांटा गया उनमें 60 फीसदी गैर मुस्लिम हैं।

यहाँ भाजपा के समक्ष भीषण विरोधाभास है। यदि वह इंदिरा गांधी और मुजीबुर रहमान के समझौते के मुताबिक 25 मार्च, 1971 को कटऑफ मानती है तो मुस्लिमों से अधिक हिंदू इसमें फंसेंगे। यदि सरकार इससे पीछे जाना चाहती है तो कितना पीछे जाएगी? भाजपा ने इसे अद्यतन सीएबी से हल करने का प्रयास किया है। असम के लोग इसे स्वीकार नहीं करेंगे। छठी अनुसूची में जनजातीय राज्यों और असम के जिलों को संरक्षण देने की बात शामिल है लेकिन उसके चलते असम के स्थानीय लोगों को और अधिक बंगाली हिंदुओं को स्वीकार करना होगा।

निष्कर्ष

सामान्य परिस्थितियों में हम यहाँ भाजपा के लिए सर वॉल्टर स्कॉट की उक्ति का प्रयोग कर सकते थे: ‘ओह! धोखा देने के पहले प्रयास में हम कितना महीन जाल बुनते हैं!’ परंतु भाजपा यह भी जानती है कि सीएबी को नई देशव्यापी एनआरसी प्रक्रिया से जोड़कर देखें तो यह एकदम विफल विचार है। जहाँ यह लागू भी है वहाँ यह एक विभाजनकारी, ध्रुवीकरण करने वाला विचार है। इसके विरोधियों को इसके खिलाफ खड़ा होना पड़ रहा है और इस पर ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का आरोप लग सकता है। यह अगले तीन दशकों के लिए अनुच्छेद 370 या राम मंदिर जैसा मुद्दा बन सकता है।