विलय और विनिवेश की राह पर नई सरकार

सन्दर्भ :
वर्ष 2017 में भारतीय स्टेट बैंक के साथ उसके पांच सहायक बैंकों और एक महिला बैंक का विलय किया गया। फिर एक अप्रैल 2019 को बैंक ऑफ बड़ौदा के साथ देना बैंक और विजया बैंक का विलय किया गया। अब चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में पंजाब नेशनल बैंक के साथ सिंडिकेट बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, आंध्रा बैंक और इलाहाबाद बैंक का विलय किया जा सकता है। आने वाले दिनों में सामान्य बीमा क्षेत्र के तीन बीमा कंपनियों जैसे नेशनल इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड और ओरिएंटल इंश्योरेंश कंपनी लिमिटेड का आपस में विलय का प्रस्ताव है। तेल और प्राकृतिक गैस निगम के साथ हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के विलय करने का प्रस्ताव है। पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन के साथ रूरल इलेक्टिफिकेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड का विलय किया जाने वाला है। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2019-20 में सरकारी उपक्रमों के विनिवेश से 90,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाने का लक्ष्य रखा है। पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने विनिवेश से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था। चालू वित्त वर्ष में टीएचडीसीआइएल, रेल टेल, टीसीआइएल कंपनियों का विनिवेश किया जा सकता है।
एयर इंडिया को बेचने की तैयारी :
वर्ष 2018 में सरकार एयर इंडिया में 76 प्रतिशत अपनी हिस्सेदारी बेचना चाह रही थी, लेकिन अल्पांश हिस्सेदारी बेचे जाने के कारण एयर इंडिया को खरीदने के लिए कोई कंपनी तैयार नहीं हुई। सत्ता में पुन: वापस आने के बाद मोदी सरकार एयर इंडिया में अपनी शत-प्रतिशत हिस्सेदारी बेच सकती है। नागरिक उड्डयन मंत्रलय और वित्त मंत्रलय के निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग ने एयर इंडिया के विनिवेश पर काम करना शुरू कर दिया है। इस संबंध में नागरिक उड्डयन सचिव ने एयर इंडिया को एक पत्र भी लिखा है। इस संबंध में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र के साथ उनकी बातचीत हुई है। एयर इंडिया पर फिलहाल तकरीबन 27,000 करोड़ रुपये का कर्ज है।
कर्ज को कम करने की कोशिश :
अप्रैल 2012 में घोषित बेलआउट पैकेज के तहत एयर इंडिया को सरकार अब तक 26,000 करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी दे चुकी है। कर्ज की समस्या निबटाने के लिए सरकार ने एक अलग कंपनी बनाकर एयर इंडिया के 27,500 करोड़ रुपये के कर्ज को कम किया है। अब फिर से एयर इंडिया का 29,464 करोड़ रुपये की कार्यशील पूंजी ऋण नई कंपनी एयर इंडिया ऐसेट होल्डिंग्स को स्थानांतरित की जाएगी जिससे एयर इंडिया पर 25,000 करोड़ रुपये का कर्ज रह जाएगा जो मुख्य रूप से विमान खरीद से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा ब्याज भार भी 4,400 करोड़ रुपये सालाना से घटकर सिर्फ 1,700 करोड़ रुपये रह जाएगा। अधिक निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार की योजना इसके कर्ज को घटाकर 10,000 करोड़ रुपये के स्तर पर लाने की है।
क्यों घाटे में एयर इंडिया :
पूर्व में किए गए एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के विलय के वक्त एयर इंडिया 100 करोड़ रुपये के मुनाफे में थी, लेकिन अनियमितता, गलत प्रबंधन और अंदरूनी गड़बड़ियों के कारण इसकी स्थिति खस्ताहाल हो गई। अदालत में दायर एक जनहित याचिका के मुताबिक वर्ष 2004 से वर्ष 2008 के दौरान विदेशी विनिर्माताओं को फायदा पहुंचाने के लिए 67,000 करोड़ रुपये में 111 विमान खरीदे गए। करोड़ों-अरबों रुपये खर्च करके विमानों को पट्टे पर लिया गया एवं निजी विमानन कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए फायदे वाले हवाई मार्गो पर एयर इंडिया के उड़ानों को जानबूझकर बंद किया गया, जिसकी पुष्टि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी अपनी रिपोर्ट में की है। निजी विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली सरकारी नीतियों के कारण इंडिगो, स्पाइसजेट, गो एयर आदि ने कमाई में एयर इंडिया से बढ़त हासिल कर ली है। विदेशी विमानन कंपनियों में लुफ्तहंसा समूह, ब्रिटिश एयरवेज, केएलएम इत्यादि से भी एयर इंडिया को कड़ी चुनौती मिल रही है।

घाटे से उबारने की कोशिश :
एयर इंडिया के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक अश्विनी लोहानी की अगुआई में एयर इंडिया को घाटे से उबारने की कोशिश की गई, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई है। हालांकि उनके प्रयास से एयर इंडिया कुछ महीनों तक परिचालन मुनाफे में जरूर रही। एयर इंडिया आठ सालों के बाद परिचालन लाभ अर्जित करने में कामयाब रही थी, लेकिन बाद में अपने प्रदर्शन में वह निरंतरता नहीं रख सका। वित्त वर्ष 2015-16 से 2017-18 के बीच उसका राजस्व 20,526 करोड़ रुपये से बढ़कर 22,146 करोड़ रुपये हो गया, लेकिन इसी अवधि में कंपनी का शुद्घ घाटा भी 3,837 करोड़ रुपये से बढ़कर 5,765 करोड़ रुपये हो गया।
निष्कर्ष :
इसमें दो राय नहीं कि आज बीएसएनएल और एमटीएनएल की माली स्थिति अच्छी नहीं है। एयर इंडिया की बदहाली की वजह से इसे निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है। देखा जाए तो सरकारी नीतियों की वजह से ही बीएसएनएल व एमटीएनएल एवं एयर इंडिया आज डूबने के कगार पर आ गए हैं। आज भी अनेक सरकारी उपक्रम मुनाफे में चल रहे हैं, लेकिन सरकार ने सरकारी उपक्रमों को राजस्व कमाने का सबसे बड़ा स्नोत मान लिया है। इसी नीति के तहत सरकार हर साल सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम कर रही है।
हालांकि सरकारी उपक्रमों के विलय से परिचालन लागत व दूसरे खर्चो में कमी, लाभ में बढ़ोतरी, जोखिम प्रबंधन में आसानी, प्रदर्शन में बेहतरी, पूंजी निर्माण में तेजी आदि आने की संभावना है। इससे प्रशिक्षित मानव संसाधन में बढ़ोतरी, प्रशिक्षण के खर्च में कमी, पूंजी व संसाधनों की उपलब्धता में वृद्धि आदि भी आ सकती है। मौजूदा समय में छोटे बैंक पूंजी की कमी के कारण न तो अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग मानकों को पूरा कर पा रहे हैं और न ही सस्ती दर पर ग्राहकों को कर्ज उपलब्ध करा पा रहे हैं। एनपीए और जोखिम प्रबंधन में भी वे फिसड्डी साबित हो रहे हैं। बेहतर तकनीक के अभाव में उनकी ग्राहक सेवा अच्छी नहीं है। बैंक से इतर दूसरे सरकारी उपक्रमों के छोटे स्वरूप के कारण उनका खर्च ज्यादा है और मुनाफा कम। ऐसे में विलय से सरकारी उपक्रम हर मोर्चे पर बेहतर प्रदर्शन करेंगे, यह उम्मीद की जा सकती है।

साभार : दैनिक जागरण

(सतीश सिंह)