लोकतंत्र को चाहिए सशक्त संस्थाएं

अदालत की भाषा

सन्दर्भ

कोई लोकतंत्र कितना सशक्त अथवा कितना दुर्बल होता है, यह उसके संस्थानों की स्थिति पर निर्भर करता है। जब लोकतंत्र का पराभव शुरू होता है तब न्यायिक तंत्र उसकी सबसे पहली भेंट चढ़ता है। इतिहास पर नजर डालें तो ये बातें सही मालूम पड़ेंगी। जब भी न्यायिक स्वतंत्रता खतरे में होती है तो उसके बाद उपद्रव, अशांति और अराजकता की स्थिति बनती जाती है। न्यायिक तंत्र की नाकामी के ये सभी स्वाभाविक परिणाम होते हैं।

न्यायिक तंत्र का मजबूत ढांचा

किताबों, वृत्तचित्रों, फिल्मों और तमाम विद्वत शोध अनुसंधानों के रूप में 1933 से 1945 के बीच जर्मनी में नाजी शासन के तमाम पहलू उजागर हुए हैं। हालांकि उस दौर में इस पहलू को अमूमन अनदेखा कर दिया गया कि तब न्यायिक तंत्र चरणबद्ध ढंग से चरमरा गया। वर्ष 1933 में सत्ता में नाजियों के दबदबे के शुरुआती दौर से पहले एडोल्फ हिटलर न्यायपालिका के खिलाफ बहुत जहर नहीं उगलता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि जर्मन न्यायिक तंत्र का स्वरूप संघीय होने के साथ-साथ उसकी जड़ें स्वायत्त न्यायपालिका के पारंपरिक पाश्चात्य कानूनी ढांचे में जुड़ी थीं। इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता कि न्यायिक तंत्र का यह मजबूत ढांचा नाजियों को खटकता था।

जर्मनी में नाजियों ने विशेष अदालतें गठित कीं

हिटलर के चांसलर बनने के तीन हफ्तों के भीतर ही स्थिति स्पष्ट होने लगी जिस मामले को राइसटाग फायर केस के नाम से जाना जाता है। हिटलर को उम्मीद थी कि न्यायाधीश इस मामले में कम्युनिस्टों की बड़ी साजिश देखेंगे, लेकिन न्यायाधीश ने केवल एक कम्युनिस्ट को ही दोषी ठहराया। कुपित हिटलर ने अपने प्राधिकार का फायदा उठाते हुए इस मामले के बाद अपना खुद का न्यायिक तंत्र बना लिया। यह जर्मनी के अदालती तंत्र के अनुक्रम ढांचे और यहां तक कि जर्मन कानूनी ढांचे के दायरे से बाहर था। इस तरह नाजियों ने ज्योंडरगेरिश्टे के रूप में विशेष अदालतें बनाईं।

जर्मन न्यायिक तंत्र ने तोड़ा दम

इन अदालतों के अधिकार भी असीमित थे। ऐसा कोई भी अपराध जो नाजियों को राजनीतिक रूप से खटके, उसका फैसला वहीं होता। इसका भयानक स्वरूप 1934 में फॉक्सगेरिश्टोफ यानी जन अदालतों के रूप में सामने आया। ये अदालतें देशद्रोह के कथित मामलों की सुनवाई करती थीं। इसके साथ जर्मन न्यायिक तंत्र ने दम तोड़ दिया। हालात की भयावहता का अंदाजा 26 अप्रैल, 1942 को राइसटाग में हिटलर द्वारा न्यायपालिका को संबोधन में जाहिर होता है। तब हिटलर ने कहा था, ‘मैं जर्मन विधि पेशेवरों से अपेक्षा करता हूं कि वे यह बात समझते हैं कि देश उनसे नहीं है, बल्कि देश है तो वे हैं। अब से मैं इन मामलों में दखल दूंगा और उन न्यायाधीशों को हटाऊंगा जो वक्त की जरूरत को नहीं समझेंगे।’

नाजी पार्टी को तरजीह

तब नाजी जर्मनी में न्यायाधीशों को निर्देश दिया गया कि यदि नाजी पार्टी और कानून के बीच कोई टकराव हो तो उसमें नाजी पार्टी के रुख को ही तरजीह दी जाए। दिलचस्प बात यह है कि नाजी जर्मनी में न्यायाधीश तबका सबसे कम प्रताड़ित समूहों में रहा। शायद ही किसी को यातना शिविरों में भेजा गया होगा। उनकी सहमति भी स्वैच्छिक और व्यवस्था के समक्ष दंडवत होने जैसी थी। कानूनी मुहर के इस्तेमाल से नाजी अत्याचारों को वैधता प्रदान करना अपवाद नहीं, बल्कि चलन बन गया था।

मुसोलिनी की अधिनायकवादी राज्य की अवधारणा

इससे पहले 1920 के दशक में इटली में बेनितो मुसोलिनी ने इस धारणा को स्थापित किया कि, ‘फासीवाद से गठित राज्य स्वयं में एक आध्यात्मिक एवं नैतिक तथ्य है। चूंकि राष्ट्र के राजनीतिक, विधिक एवं आर्थिक संगठन साकार रूप हैं और ऐसे संगठन अपनी उत्पत्ति एवं विकास में निश्चित रूप से एक वैचारिक पहलू के प्रतिनिधि होने चाहिए।’ मुसोलिनी ने अधिनायकवादी राज्य की अवधारणा पेश कर उसे मूर्त रूप दिया।

कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका एक ही संस्था में समाहित

मुसोलिनी के अनैतिक वर्चस्व वाले दौर में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका जैसी तीन शक्तियां एक ही संस्था में समाहित हो गईं। मुसोलिनी ने प्राचीन रोमन साम्राज्य की श्रेष्ठता की चाशनी में अपने जुमलों से भविष्य की चमकदार तस्वीर का मुगालता पेश करके एक अनैतिक राज्य बनाया जहां फासीवाद के समक्ष कानून के राज ने दम तोड़ दिया था। प्राकृतिक अधिकारों और अदालतों की स्वायत्तता की धारणा उनकी योजनाओं में शामिल ही नहीं थी। निरंकुश शासकों ने फासीवादी न्याय को ही लागू कर दिया जिस पर रीढ़विहीन न्यायिक वर्ग मुहर लगा देता था।

स्टालिन ने न्यायिक तंत्र को ताक पर रखा

हालांकि कानून को खिलौना बनाकर खेलने वालों में जोसेफ स्टालिन का नाम सबसे ऊपर आएगा। स्टालिन ने न्यायिक तंत्र को ताक पर रखते हुए एक ही झटके में अपने विरोधियों को निपटा दिया। वर्ष 1936 से 1938 के बीच मॉस्को ट्रायल इतिहास में न्यायिक ढकोसले की सबसे बड़ी मिसाल है। बोल्शेविक दल के पुराने लोगों को पूरी तरह खत्म कर देना ही इस कवायद का इकलौता मकसद था ताकि स्टालिन खुद को राज्य के पर्याय के रूप में स्थापित कर सके।

सोवियत के शीर्ष सात नेताओं की हत्या करने का षड्यंत्र

15 अगस्त, 1936 को सोवियत समाचार एजेंसी ने सूचना दी कि रूसी सरकारी अभियोजक ने ग्रेगरी जिनोवेव, लियोन कामेनेव, आइएम स्मिरनोव और 13 अन्य को नाजी शासन के साथ मिलकर सोवियत के शीर्ष सात नेताओं की हत्या करने का षड्यंत्र रचा। इससे तकरीबन डेढ़ साल पहले एसएम किरोव की हत्या का भी उन्हें दोषी ठहराया गया। इसके नौ दिन बाद 24 अगस्त को ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष ने सभी आरोपियों को मौत की सजा के साथ ही उनकी संपत्ति जब्त करने का फैसला सुनाया। इसके चौबीस घंटे से भी कम अवधि में सजायाफ्ता लोगों की दया याचिका खारिज करने के साथ ही उन्हें सजा भी दे दी गई। एक कथित आतंकी साजिश के खुलासे के महज एक पखवाड़े के भीतर ही न्यायिक ढकोसले के बाद 16 लोगों को निर्ममतापूर्वक मार डाला गया। उनमें रूसी क्रांति और अक्टूबर क्रांति में शामिल दिग्गजों के नाम भी थे। फैसले में यह निर्देश भी था कि लियोन ट्रोट्स्की और उनके बेटे एलएल सेदोव की भी उन्हीं आरोपों के मामले में पेशी की जाए। दोनों ‘पिता और पुत्र’ स्टालिन की आंखों के कांटे थे।

पिनोशे की तानाशाही

इसके सड़सठ साल बाद सितंबर 2013 में चिली की नेशनल एसोसिएशन ऑफ जूडिशियल मजिस्ट्रेट ने बयान जारी कर पिनोशे की तानाशाही के पीड़ितों से माफी मांगते हुए कहा कि उन्हें ‘अपने दायित्वों का गलत तरीके से निर्वहन करने के लिए’ क्षमा करें। उसमें यह स्वीकारोक्ति भी थी कि हमारी अदालतों ने हजारों शिकायतों को खारिज कर दिया। सरकारी एजेंटों के आपराधिक कृत्यों की जांच से लगातार इन्कार और यातना केंद्रों की गतिविधियों की पड़ताल से हिचक ने नि:संदेह इस दौर में मानव अधिकारों का पीड़ादायक असंतुलन पैदा किया। इस पाप से मुक्ति की मनुहार करते हुए मजिस्ट्रेटों ने पिनोशे के 17 वर्षों के शासन के दौरान सुप्रीम कोर्ट से उसकी भूमिका को लेकर भी जवाब तलब किया।

जॉन फिल्पॉट कुर्रन ने कहा भी है कि ईश्वर ने शाश्वत जागरूकता की शर्त पर ही मनुष्य को स्वतंत्रता प्रदान की है।

साभार : दैनिक जागरण (मनीष तिवारी)