भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर पर ओआईसी का प्रस्ताव ख़ारिज

संदर्भ

हाल ही में आयोजित इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अतिथि थी। यह पहली बार है कि भारत ओआईसी की बैठक में शामिल किया गया है, जो 57 इस्लामिक देशों का एक प्रभावशाली समूह है। वर्ष 1969 में इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद, जो बाद में राष्ट्रपति बने, को ओआईसी रबात सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन पाकिस्तान के विरोध के कारण इस आमंत्रण को वापस ले लिया गया था।

ओआईसी (OIC) इस्लामिक सहयोग संगठन की स्थापना

इस्लामिक सहयोग संगठन (Organisation of Islamic Cooperation—OIC) की विधिवत स्थापना 30 संस्थापक सदस्य के साथ रबात (मोरक्को) में 1969 में ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द इस्लामिक कांफ्रेंस के रूप में हुई। वर्ष 1970 में विदेश मंत्रियों की पहली बैठक सम्पन्न हुई, जिसमें जेद्दा में सचिवालय बनाने पर सहमती बनी।

ओआईसी के चार्टर को 1972 में अपनाया गया। यह दुनिया के विभिन्न लोगों के बीच अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव को बढ़ावा देने की भावना के साथ मुस्लिम दुनिया के हितों की रक्षा और संरक्षण का प्रयास करता है।

28 जून, 2011 को अस्ताना कजाखस्तान में इसका नाम ऑर्गेनाइजेशन ऑफ द इस्लामिक कांफ्रेंस से बदलकर ऑर्गेनाइजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन किया गया।

ओआईसी में भारत की भागीदारी

पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कूटनीतिक समर्थन के लिए भारत की विदेश मंत्री ने अपने सम्बोधन में कहा कि ओआईसी देशों को आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों को आतंकवादी शिविरों के बुनियादी ढांचे को खत्म करने के लिए कहना चाहिए और उन्हें आतंकवादी संगठनों को धन और आश्रय प्रदान करने से रोकना चाहिए।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी धर्म विशेष के खिलाफ संघर्ष नहीं है। भारत के 185 मिलियन मुस्लिम भारत की विविधता के सूक्ष्म ब्रह्मांड हैं और वे मजबूत सांस्कृतिक और भाषाई विरासत बनाते हैं तथा अपने मुस्लिम एवं गैर-मुस्लिम भाइयों के साथ सद्भावपूर्ण रहते हैं। भाषण में एक बार भी पाकिस्तान का नाम लिए बिना विदेश मंत्री की यह टिप्पणी स्पष्ट रूप से इस्लामाबाद को इंगित हो रही थी।

ओआईसी को संबोधित करने वाली पहली भारतीय मंत्री,  सुषमा स्वराज ने कुरान और अन्य धार्मिक ग्रंथों के उद्धरण से भारत की विविधता- जिस कारण भारत में बहुत ही कम मुस्लिम कट्टरपंथी और चरमपंथी विचारधारा के जहरीले प्रचार के शिकार हुए हैं, की प्रशंसा की। विविधता कट्टरता को नियंत्रित करती है।

पाकिस्तान द्वारा भारत के आमंत्रण रद्द करने की मांग के बीच ओआईसी में भारत ने भागीदारी की। मेजबान देश, संयुक्त अरब अमीरात द्वारा भागीदारी की रद्द करने की मांग ठुकरा देने के कारण पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने प्लेनरी का बहिष्कार किया।

भारत आतंकवाद के खिलाफ़ संघर्ष हेतु सभी देशों को एकजुट करने का प्रयास कर रहा है। ओआईसी के मंच पर भी भारत ने आतंकवाद के मुद्दे को उठाया और स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं है। हम संवेदनहीन आतंकवादी हिंसा के कारण भयानक विनाश देख रहे हैं। यह लोगों के जीवन को लील रहा है, क्षेत्रों को अस्थिर कर रहा है और दुनिया को संकट में डाल रहा है। आतंक की पहुंच, तीव्रता और इससे दुष्प्रभावित लोगों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में सभी देशों को आतंकवाद के खिलाफ़ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।

जम्मूकश्मीर पर ओआईसी का दृष्टिकोण

इस्लामिक देशों के संगठन (OIC) द्वारा जम्मू और कश्मीर पर लाये गए एक प्रस्ताव लाया गया जिसमें भारतीय आतंकवाद(Indian terrorism) और सामूहिक अंधेरगर्दी (Mass Blindings) का उल्लेख किया गया है। भारत सरकार ने इसका विरोध किया है।

जम्मू और कश्मीर पर प्रस्ताव के बाद एक अन्य प्रस्ताव ‘भारत पाकिस्तान शांति प्रक्रिया’ सुषमा स्वराज के संबोधन के अगले दिन लाया गया। इसमें पाकिस्तान के शांति प्रयासों की तारीफ़ की गयी और विश्व के अल्पसंख्यकों पर एक वतव्य दिया गया, जिसमें भारत सरकार से अयोध्या में बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण का आह्वान किया गया।

अबू धाबी में इस्लामिक देशों के संगठन के विदेश मंत्रियों के बैठक के तुरंत बाद भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा वतव्य ज़ारी किया गया, जिसमें जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताया गया और कहा गया कि इसका मसला भारत का आंतरिक मसला हैं। साथ ही, भारत को ओआईसी में आमंत्रित करने के लिए उनकी प्रशंसा की गई।

यह रेखांकित करते हुए कि ‘अबू धाबी घोषणा’ दस्तावेज़ जो मुख्य विज्ञप्ति है, में भारत के संदर्भ में कोई नकरात्मक उल्लेख नहीं है, अधिकारियों ने उपर्युक्त वतव्य एवं बयानों को अधिक महत्त्व नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘अबू धाबी घोषणा’ से इतर अन्य प्रस्ताव के लिए आम सहमति आवश्यक नहीं है। दरअसल ये देश विशेष के पक्ष हैं, जो प्रायः बिना विरोध के शामिल कर लिए जाते हैं।

संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्लाह के अनुसार इस्लामिक देशों के संगठन ने भारत को बहुत स्पष्ट और सकरात्मक संकेत भेजा है और आगे भारत से रिश्तों को इस तरह बढ़ाना चाहता है कि एक दिन भारत इस्लामिक देशों के संगठन में शामिल हो जाए।

निष्कर्ष

यह ध्यान रखना जरूरी है कि भारतीय संदर्भों के साथ जारी किए गए बयानों की भाषा कठोर है और जबकि ओआईसी द्वारा जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर नियमित रूप से बयान जारी किए जाते रहे हैं जिसमें भारतीय सेना पर अत्याचार के आरोप लगाए जाते हैं। भारत-पाकिस्तान के बीच शांति प्रक्रिया पर बयान असामान्य है, कम से कम फरवरी, 2019 के महीने के दौरान तनाव और इस तथ्य को देखते हुए कि दोनों देशों के बीच वर्तमान में कोई संवाद नहीं है। एक पैरा में, संकल्प, भारतीय बलों द्वारा संघर्ष विराम उल्लंघन के अभूतपूर्व वृद्धि की प्रवृत्ति की निंदा करता है। जम्मू और कश्मीर प्रस्ताव में, ओआईसी सदस्यों से कश्मीरी लोगों को मानवीय सहायता के लिए धन जुटाने की अपील करने की अनुशंसा की गई है।