भारत की निर्यात बाधा और ‘फैक्टरी एशिया’

सन्दर्भ

प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में निर्यात बढ़ाने की जरूरत पर बल देकर भारतीय अर्थव्यवस्था की नीतिगत प्राथमिकताओं के बारे में स्पष्ट संकेत दिए थे। हालांकि मुख्य आर्थिक सलाहकार ने हाल ही में कहा था कि वैश्विक निर्यात में भारत के उत्पाद निर्यात की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम होने से इसमें काफी संभावनाएं देखने को लेकर वस्तुस्थिति परीक्षण की जरूरत है। वैश्विक कारोबार में भारत की निर्यात हिस्सेदारी पांच वर्षों से अधिक समय से दो फीसदी के आसपास ही रही है। 

भारत की निर्यात स्थिति

वित्त वर्ष 2014-15 और 2015-16 में नकारात्मक वृद्धि दर्ज करने के बाद निर्यात वृद्धि ने बाद के दो वर्षों में कुछ तेजी पकड़ी लेकिन 2018-19 में यह दोबारा सुस्त पड़ गई। यह अब भी चिंता का बड़ा मुद्दा है। इसके अलावा, भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में पांच फीसदी से कम बढ़ोतरी ही देखने को मिली है। निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता वर्ष 2012 के बरक्स 2017 में शीर्ष 20 भागीदार देशों में बाजार हिस्से के अनुपात के तौर पर परखी जाती है। बड़े वैश्विक निर्यात रुझान के अनुपात में भारत के निर्यात रुझान का अधिक विस्तृत विश्लेषण अन्य अहम कमजोरियां दर्शाता है और एक अधिक संयमित नजरिया अपनाने का सुझाव देता है।

मुख्य कमजोरियां और संतुलित नजरिया

पहला, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में उत्पादों के कारोबार की ही प्रमुखता होती है और सेवा कारोबार उत्पाद व्यापार के कुल मूल्य के एक तिहाई से भी कम है। उत्पाद श्रेणी में वैश्विक कारोबार का करीब आधा हिस्सा मध्यवर्ती उत्पादों का होता है और उपभोक्ता उत्पाद, कच्चा माल, पूंजी उत्पाद श्रेणियों में मात्रा बढऩे के बावजूद यह अनुपात कमोबेश ऐसा ही रहेगा।

दूसरा, पिछले दो दशकों में वैश्विक कारोबार मुख्य रूप से वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (जीवीसी) से ही पोषित होता रहा है। कई जीवीसी के लिए उत्पादों को कई बार सीमा के आर-पार जाना पड़ता है। उत्पादन प्रक्रिया के अंतर्निहित विखंडन ने अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञता का दायरा बढ़ा दिया है। उत्पादों के बीच तक सीमित न रहकर अब अलग-अलग उत्पादों के उत्पादन के विभिन्न चरणों में विशेषज्ञता हो चुकी है। नतीजतन, विकासशील देशों के लिए जीवीसी के साथ सामंजस्य बिठाने के लिए तुलनात्मक सुविधा के नए स्रोत सामने आए हैं। जीवीसी में भागीदारी का ताल्लुक निर्यात विभिन्नता, परिष्कार और बढ़ी हुई उत्पादकता से है।

तीसरा, मूल्य शृंखला काफी हद तक क्षेत्रीय है और एशिया, यूरोप एवं उत्तर अमेरिका वैश्विक उत्पादन के तीन बड़े केंद्र हैं। गत दशक में ‘फैक्टरी एशिया’ पूरी दुनिया में उत्पादन का सबसे गतिशील केंद्र रहा है। चीनी अर्थव्यवस्था और आसियान देशों के कायांतरण ने एशिया को समूची दुनिया के उत्पादन की फैक्टरी बना दिया। इसने अनवरत रूप से अंतर-क्षेत्रीय कारोबार में बढ़ोतरी दर्ज की है जो आर्थिक एकीकरण के स्तर और उत्पादों के सीमापार आवाजाही की सुगमता के बीच मूलभूत रूप से सकारात्मक अंतर्संबंध दिखाता है। क्षेत्रीय उत्पादन के दो अन्य केंद्रों- यूरोप और उत्तर अमेरिका भी मुख्य रूप से जर्मनी और अमेरिका तक केंद्रित रहे हैं और यहां पर अंतर-क्षेत्रीय कारोबार में मामूली गिरावट देखी गई है लेकिन उनका फैक्टरी एशिया के साथ क्षेत्रीय संपर्क मजबूत हुआ है।

वैश्विक निर्यात का तुलनात्मक नजरिया

वैश्विक निर्यात रुझानों के उलट वैश्विक सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी वैश्विक वाणिज्य निर्यात हिस्सेदारी का दोगुना है। वाणिज्य निर्यात की तुलना में सेवा निर्यात का अनुपात 2000-01 के 35.8 फीसदी से बढ़कर 2016-17 में 58.2 फीसदी हो चुका है। भारत का वाणिज्य उत्पाद श्रेणी में सबसे बड़ा हिस्सा उपभोक्ता उत्पादों (44 फीसदी) का है जिसके बाद मध्यवर्ती उत्पाद निर्यात (33 फीसदी) का नंबर आता है। जीवीसी के साथ भारत का एकीकरण जी-20 देशों में सबसे कम है। आसियान देशों की तुलना में भारत का जीवीसी एकीकरण न केवल बहुत कम है बल्कि इसके बैकवर्ड एवं फॉरवर्ड दोनों ही गतिविधियों में गिरावट आई है। इसकी तुलना में आसियान देशों का बैकवर्ड जीवीसी संपर्क भले ही कम हुआ है लेकिन पहले काफी ऊंचे स्तर पर था और उनका फॉरवर्ड जीवीसी संपर्क स्थिर बना हुआ है। वियतनाम तो एकदम अलग तरह का अनुभव दिखाता है: उसका जीवीसी एकीकरण काफी उच्च स्तर पर है और इस अवधि में उसका बैकवर्ड एकीकरण स्थिर दर से बढ़ा है। 

इसके अलावा जीवीसी गतिविधि के मुख्य केंद्र पूर्व एशिया एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मूल्य शृंखला एकीकरण कमजोर बना हुआ है। भारत में हुए मूल्य-वर्धन का पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई निर्यात के रास्ते वैश्विक कारोबार में अंशदान महज एक टुकड़ा है। वर्ष 2016 में भारत का मूल्य-वर्धन अंशदान वियतनाम के अंशदान का महज चौथा हिस्सा था और आसियान समूह के अंशदान का तो तीन फीसदी ही थी। आसियान के उप-क्षेत्रों के साथ जीवीसी संपर्क के मामले में भी यही सच है। भारत में सृजित और दुनिया को होने वाले आसियान निर्यात में शामिल होने वाला मूल्य-वर्धन वियतनाम के आसियान निर्यात का 11 फीसदी ही है। इतनी कम भागीदारी होने का मतलब है कि भारत के निर्यात की मांग आसियान देशों से नहीं तेजी पकड़ रही है। ऐसे में भारत के विनिर्मित उत्पादों का आसियान को निर्यात बीते दशक में शायद ही बदला है।

विभिन्न क्षेत्रकों की स्थिति

आखिर में, भारत के शीर्ष निर्यात क्षेत्रों में शामिल मोटर वाहन, कपड़ा एवं परिधान क्षेत्र मूल्य शृंखला एकीकरण के उच्चतम स्तर वाले क्षेत्र भी हैं। लेकिन पिछले वर्षों में इन दोनों क्षेत्रों में भारत का जीवीसी एकीकरण गिरा है। कपड़ा एवं परिधान निर्यात में आयात की मात्रा वर्ष 2005 में 15.3 थी लेकिन 2016 में यह घटकर 13.4 फीसदी पर आ गई। मोटर वाहनों के निर्यात में भी आयात हिस्सेदारी 25.3 फीसदी से घटकर 23.5 फीसदी पर आ गई। इसी के साथ वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी कपड़ा एवं परिधान क्षेत्र में खासी गिरी है और वाहन क्षेत्र में नगण्य स्तर पर बनी हुई है। इन तीनों क्षेत्रों के लिए इनपुट माल पर आयात शुल्क बढ़ाने की नीति का परिणाम कमतर उत्पादों के इस्तेमाल या उत्पादन की लागत बढऩे के तौर पर सामने आ सकता है जो प्रतिस्पर्धा में बने रहने और बाजार हिस्सेदारी गंवाने का खतरा पैदा करता है। 

आगे की राह

इस तरह भारत की व्यापार नीतियों को वाणिज्य उत्पादों के व्यापार में बढ़ोतरी करने लायक बनाने की जरूरत है ताकि पूर्व एवं दक्षिण-पूर्व एशिया की क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं के साथ सामंजस्य बनाया जा सके। इसके साथ ही आयात शुल्क वृद्धि के संरक्षणवादी कदमों से भी बचा जाना चाहिए क्योंकि इससे भारत अपने शीर्ष निर्यात क्षेत्रों में मिली बढ़त भी गंवा सकता है।

साभार : बिज़नेस स्टैंडर्ड (अमिता बत्रा)