ब्रिक्स की बाधाएं और भविष्य

सन्दर्भ

ब्राजील की राजधानी ब्रासीलिया में संपन्न ब्रिक्स के ग्यारहवें सम्मेलन का मुख्य विषय ‘ब्रिक्स : एक उन्नत भविष्य के लिए आर्थिक प्रगति’ था। पांचों सदस्य देशों ने अपनी आवश्यकताओं और नवोन्मेषी प्रौद्योगिकियों को ब्रिक्स देशों के बीच संचालित करने के विषय सम्मेलन में रखे। सम्मेलन की समाप्ति पर जो साझा बयान जारी किया, उसमें सदस्य देशों के बीच परस्पर संपर्क और विश्व व्यवस्था, विशेषरूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ ब्रिक्स के समुचित संपर्कों की रूपरेखा और उपलब्ध्यिों का उल्लेख है। ब्रिक्स राष्ट्रों ने उन्नत ब्रिक्स कार्यक्रम की अद्यतन रूपरेखा अपनाने, ब्रिक्स ऊर्जा (भारत की पहल पर सौर ऊर्जा) सहयोग मंच साकार करने, ब्रिक्स महिला व्यवसाय संस्था का गठन करने, ब्रिक्स व्यापार व निवेश से जुड़ी कंपनियों और एजेंसियों के बीच हस्ताक्षरित सहमतियों-समझौतों को ठोस स्वरूप प्रदान करने की दिशा में सहमति जताई।

सूचना और कंप्यूटिंग

रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स के मध्य सूचना और कंप्यूटिंग के क्षेत्र में सुरक्षात्मक सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। पुतिन के अनुसार वे ब्रिक्स सहित अन्य देशों को उनके अपने देश में विकसित की गई उन अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के उपयोग की सलाह देना पंसद करेंगे, जो सूचना व कंप्यूटिंग आधारित वैश्विक लेन-देन को मौलिक एंटी-वायरस कार्यक्रमों से सर्वोत्तम सुरक्षा उपलब्ध कराती हैं। पुतिन ने ब्रिक्स देशों के लिए एक आंकड़ा-विनिमय कार्यक्रम का प्रस्ताव भी रखा है।

संरक्षणवाद और आर्थिक चुनौतियां

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने विश्वस्तर पर बढ़ रहे संरक्षणवाद और आर्थिक चुनौतियों के संदर्भ में चिंता व्यक्त की। इस संदर्भ में उनका साफ इशारा अमेरिका की ओर था। जिनपिंग का कहना था कि व्यावसायिक संरक्षण की नीतियों ने व्यापक संकट उत्पन्न कर दिया है और इससे न केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश प्रभावित हुआ है, बल्कि वैश्विक आर्थिक प्रगति भी प्रभावित हुई है। हालांकि अमेरिका से व्यापार युद्ध में उलझने के बाद वैश्विक आर्थिक मंदी का एक कालखंड व्यतीत हो रहा है, फिर भी चीन की विकास दर प्रशंसनीय है और इसीलिए चीन का अर्थतंत्र संपूर्ण विश्व के लिए व्यापार के सुनहरे अवसर उपलब्ध कराने का एक आकर्षक स्थल बना हुआ है।

कराधान और सीमा शुल्क प्रक्रिया

भारत ने ब्रिक्स सम्मेलन में ब्रिक्स देशों के बीच कराधान और सीमा शुल्क प्रक्रिया को आसान बनाए जाने के संदर्भ में उत्साह प्रदर्शित किया। भारत का मानना है कि सदस्य देशों के मध्य व्यवसाय का हितकारी वातावरण बन रहा है। भारत की दृष्टि में अंतर-ब्रिक्स व्यापार और निवेश लक्ष्यों को अधिक महत्त्वाकांक्षी अवश्य होना चाहिए। सदस्य देशों द्वारा व्यापार लागतों में कटौती किए जाने की बात पर भारत ने सहमति दिखाई और इसे उपयोगी बताया। भारत का कहना था कि ब्रिक्स को आगामी दस वर्षों में प्राथमिकता पर आधारित कुछ व्यवसाय के क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए और इसके बलबूते हम अंतर-ब्रिक्स सहयोग की रूपरेखा बनानी ताहिए। भारत का लक्ष्य वर्ष 2024 तक पांच खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का है। ऐसे में ब्रिक्स देशों के लिए भारत में निवेश करने के लिए यह बड़ा मौका है।

नवप्रवर्तन, अंतरराष्ट्रीय अपराध के विरुद्ध अभियान छेड़ना

ब्राजील ने ब्रिक्स के आयोजक के रूप में कुछ प्राथमिकताएं निर्धारित कीं, जिन पर वह सदस्यों देशों से सहयोग चाहता है। इन प्राथमिकताओं में नवप्रवर्तन, अंतरराष्ट्रीय अपराध के विरुद्ध अभियान छेड़ना, स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग, व्यापार तथा निवेश को बढ़ाना जैसे कदम शामिल हैं। दक्षिण अफ्रीका ने अपने देश में व्याप्त बेरोजगारी, गरीबी और असमानतामूलक सामाजिक स्थिति से उबरने के लिए सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश, पर्यटन, क्षमता विकास, कौशल और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की नीतियों को सामूहिक कार्यसंकल्प से जोड़ने की प्रतिबद्धता दिखाई।

पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संगठन

ब्रिक्स समूह विश्व की पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। इन देशों में विश्व की बयालीस फीसद जनसंख्या रहती है। वैश्विक जीडीपी का तेईस फीसद इनके खाते मे हैं। दुनिया का तीस फीसद भूभाग इस समूह के सदस्यों के पास है और इन पांचों देशों के बीच विश्व का अठारह फीसद व्यापार होता है। ब्रिक्स देशों के प्रमुख नेता वार्षिक सम्मलेन में जो भावी कार्ययोजनाएं प्रस्तुत करते हैं, वस्तुत: उनकी रूपरेखा इन देशों के व्यापारिक प्रतिनिधिमंडलों द्वारा व्यापक स्तर पर की गई परस्पर वार्ताओं के बाद तैयार की जाती है। अनेक बार की गई ऐसी वार्ताओं के बाद ब्रिक्स देशों के शीर्ष रणनीतिकारों को लगता है कि पांचों देशों की विभिन्न समस्याओं के उन्मूलन के लिए ब्रिक्स के वित्तीय संस्थानों को सशक्त बनाए जाने की आवश्यकता है।

आतंकवाद का मुद्दा

हालांकि इस बैठक में भारत ने अपने संबोधन में आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया और विश्व में आतंक के कारण दस खरब डॉलर की क्षति का वर्णन किया, पर लगता नहीं है कि आतंकवाद से निपटने के लिए भारत को छोड़ कोई अन्य ब्रिक्स देश बड़ी और व्यापक भागीदार करने के पक्ष में है। ब्राजील में मादक पदार्थों की अत्यधिक खपत के कारण वहां अपराध काफी ज्यादा होते हैं, परंतु यदि इस अपराध को ब्राजील उस आतंक के समान समझता है, जो पाकिस्तान और जम्मू एवं कश्मीर के रास्ते भारत विगत तीन दशकों से झेल रहा है तो यह ब्राजील की भूल है। ब्रिक्स में आतंकवाद और इसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को होने वाले आर्थिक नुकसान का जिक्र करना भारतीय कूटनीति का एक हिस्सा है, पर अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ब्रिक्स के बाकी सदस्य देश इस पर भारत ही की तरह गंभीर हैं कि नहीं।

नव आर्थिक नीतियां दीर्घकाल तक लाभकारी कैसे

ब्रिक्स देश परस्पर व्यापार, निवेश और अन्य द्विपक्षीय गतिविधियों के आदान-प्रदान के लिए यूरोपीय नीतियों के विपरीत जो सांगठनिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं, वह उस स्थिति में उपयोगी कैसे हो सकती है जिसमें ब्रिक्स के सदस्य देश अमेरिका सहित यूरोपीय और अन्य विकसित देशों के साथ एकल रूप में अपने व्यापारिक समझौते कर चुके हैं, कर रहे हैं और भविष्य में भी करते रहेंगे। यह एक बड़ी चुनौती है। अनेक पारस्परिक आवश्यकताओं के लिए बहुत ही सरलतापूर्वक विश्वग्राम में परिवर्तित हो चुके विश्व में भला ब्रिक्स के स्तर पर तैयार नव आर्थिक नीतियां दीर्घकाल तक लाभकारी कैसे हो सकती हैं, इस बिंदु पर भी विचार किए जाने की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ

ब्रिक्स में चीन, भारत और रूस महत्त्वपूर्ण देश हैं। इनमें से भी चीन की व्यापारिक कार्ययोजनाएं किसी एक संगठन या समूह को विश्वास में लेकर संचालित नहीं होती। कुछ साल पहले तक भारत भी ब्रिक्स की नीतियों को पांचों देशों के हितों के अनुकूल लागू करने में असमर्थ था। ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में ऐसी ही स्थितियां अब भी हैं। वस्तुत: इन देशों की शासकीय प्रणाली पारदर्शिता के अभाव से जूझ रही है। जहां ब्राजील मादक पदार्थों की अवैध तस्करी के संगठित व्यापार से गंभीर भ्रष्टाचार में फंसा है, वहीं दक्षिण अफ्रीका में शासकीय अयोग्यता के कारण राष्ट्रीय नीतियां ब्रिक्स के संकल्पों के अनुकूल नहीं ढल पा रहीं। रूस का बिजनेस बेस स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट प्रौद्योगिकी पर अधिक निर्भर है, जिसमें ब्रिक्स के सदस्य देशों में से केवल भारत व चीन ही कुछ सीमा तक व्यापारिक भागीदारी निभा पाते हैं। यही कारण है कि ब्रिक्स के देशों की संपूर्ण आबादी विश्व की चालीस फीसद होने के बाद भी इनके बीच केवल दस फीसद कारोबार हो पा रहा है।

साभार : जनसत्ता (विकेश कुमार बडोला)