बजट का ‘स्वदेशी’ राग वैश्विक आकांक्षा में दाग

पृष्ठभूमि : भारत की मजबूत स्तिथि

ऊंची महत्त्वाकांक्षा रखना अच्छी बात है और भारतीय अर्थव्यवस्था को वर्ष 2024 तक पांच लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य स्वागतयोग्य है। यह लक्ष्य हासिल भी किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी चीजें पहले से मौजूद हैं। भले ही भारत की जनसंख्या लंबे समय तक अपने सर्वाधिक उत्पादक स्वरूप में न रहे लेकिन फिलहाल यह उसी दौर में है। भारत के पास एक विस्तृत एवं अपेक्षाकृत परिष्कृत औद्योगिक आधार एवं गतिशील उद्यमिता है। अंतरिक्ष एवं सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) जैसे क्षेत्रों का प्रदर्शन विश्वस्तरीय है। भारत डिजिटल प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसके पास विशाल एवं बढ़ते हुए डेटा संसाधन हैं जो कृत्रिम मेधा  (एआई) एवं मशीन लर्निंग जैसे नए क्षेत्रों में भी तीव्र विकास कर सकते हैं। 

बजट का सन्देश

भारतीय बाजार के बड़े आकार का इस्तेमाल न केवल बड़ी विदेशी पूंजी एवं तकनीक के प्रवाह को लुभाने बल्कि व्यापार एवं निवेश की शर्तों को लाभदायक बनाने के लिए भी किया जा सकता है। भारत अपने प्रगति पथ के एक बेहतरीन बिंदु पर खड़ा है। हमें इन संसाधनों का फायदा उठाने के लिए साहसी आर्थिक रणनीति की जरूरत है लेकिन यह भी ध्यान में रखना होगा कि अवसर की यह खिड़की जल्द ही बंद भी हो जाएगी। हाल में पेश आम बजट में कई सकारात्मक बातें हैं। निवेश बहाली पर जोर, आधारभूत ढांचे का निर्माण, निर्यात प्रोत्साहन, वित्तीय बाजार के सशक्तीकरण एवं रोजगार सृजन पर जोर दिया गया है। लेकिन एक नीतिगत उद्देश्य के तौर पर आयात प्रतिस्थापन का दोबारा आगमन परेशान करता है। पिछले दो बजट की तरह इस बजट ने भी कई आयात पर शुल्क बढ़ाने का तरीका जारी रखा है। अब तो यह एक प्रवृत्ति बन चुकी है। 

अवैश्वीकरण की ओर

हम पर वर्ष 1991 से पहले की रणनीति की तरफ खिंचने का खतरा मंडरा रहा है जो आयात प्रतिस्थापन और संरक्षित घरेलू उत्पादन पर आधारित थी। कुछ दूसरे चिंताजनक संकेत भी हैं। इस सदी के पहले दशक में कई मुक्त व्यापार समझौते होने के बाद अब धारणा उनके खिलाफ बन चुकी है। इन समझौतों से भारत के व्यापार की कुल मात्रा में भले ही वृद्धि हुई हो लेकिन उनकी वजह से व्यापार घाटा बढ़ा भी है। आलोचना होती है कि हमारे व्यापार साझेदारों को इन समझौतों से हमारी तुलना में कहीं अधिक लाभ हुआ है। प्रस्तावित क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) पर हस्ताक्षर करने में भारत की हिचकिचाहट के पीछे भी यही धारणा है। भारत इस समझौते का हिस्सा होने पर जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड और आसियान देशों के साथ व्यापक गठजोड़ में शामिल हो जाएगा।

वैकल्पिक कदम

भारत के लिए पारस्परिक बाजार पहुंच हासिल करना और अपनी कंपनियों के लिए बराबरी का मौका दिए जाने की मांग करना वाजिब है। कुछ मुक्त व्यापार समझौतों की शर्तों की समीक्षा किए जाने की भी जरूरत पड़ सकती है। एक आयात प्रतिस्थापन रणनीति की तरफ लौटना कोई जवाब नहीं है। कुछ उत्पादों पर चुनिंदा ढंग से शुल्क बढ़ाने के साथ समस्या यह है कि इससे निहित स्वार्थ पैदा होते हैं जिनसे बाद में छुटकारा ले पाना मुश्किल होता है। भारतीय रुपये की विनिमय दर में कमी लाना बेहतर तरीका हो सकता है। इसका भी वही असर हो सकता है जो ऊंचे शुल्क से होगा और दूसरों की तुलना में कुछ उद्योगों को ही तरजीह देने वाले क्षेत्रवार असर के बगैर यह होगा। कुछ अर्थशास्त्रियों की यह दलील है कि रुपये की कीमत चढ़ी हुई है।

क्षेत्रीय व्यापार समझौते में भारत की अलाभकारी स्तिथि : आत्मनिरीक्षण का समय

मौजूदा मुक्त व्यापार समझौतों के बारे में मेरे सहकर्मी वी एस शेषाद्रि के अध्ययन से पता चलता है कि भारतीय उद्योग इन समझौतों को विस्तारित एवं अधिक विविध बाजार पहुंच के साधन से ज्यादा अपने मौजूदा निर्यात के लिए बाजार पहुंच बनाए रखने पर देखते हैं। भारतीय निर्यातक गैर-शुल्क बाधाएं दूर करने या मूल्य-वर्द्धन करने के लिए इन समझौतों में मौजूद प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकते थे लेकिन उन्होंने इसका फायदा नहीं उठाया। जापान के साथ समझौते में भारतीय दवा उद्योग की मदद की प्रतिबद्धता है जिससे जापानी बाजार में भारतीय दवाओं को प्रवेश के पहले पंजीकरण की जटिल प्रक्रिया से राहत मिल सकती है लेकिन कभी भी इसका इस्तेमाल नहीं किया गया। व्यापक समझ यही है कि भारतीय उद्योग ने मुक्त व्यापार समझौतों के प्रति रक्षात्मक रवैया अपनाया और इसे अपना बाजार फैलाने के मौके के रूप में नहीं देखा। आयात प्रतिस्थापन से इस मनोदशा में बदलाव की संभावना नहीं है। संरक्षणवादी नीतियां अपनाने से भारतीय उद्योग अधिक नहीं बल्कि कम प्रतिस्पर्द्धी बनेगा। यह निर्यात प्रोत्साहन की घोषित नीति के खिलाफ जाएगा। 

संरक्षणवाद के खतरे

वर्ष 1991 के पहले हमारा अनुभव पुख्ता सबूत देता है कि संरक्षणवाद से खराब गुणवत्ता एवं कमतर सेवा मिलती है क्योंकि उपभोक्ताओं के पास सीमित विकल्प होते हैं। यह दलील पूरी तरह गलत है कि ऊंचे शुल्क से भारतीय उद्योग को अधिक प्रतिस्पद्र्धी होने के लिए अधिक वक्त एवं स्थान मिल जाएगा। एक विदेशी निवेशक भी भारत में कम प्रतिस्पद्र्धा होने से यहां पर दोयम दर्जे एवं निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचकर खुश होता है। ऐसी स्थिति में उच्च तकनीक वाले उत्पादों एवं सेवाओं के भारतीय बाजार में आने का प्रोत्साहन कम रह जाता है। इसका नतीजा यह होगा कि भारत अपने विशाल बाजार के बावजूद आला दर्जे का निवेश नहीं जुटा पाएगा जो कि मौका गंवाने के समान होगा। विदेशी उधारी के जरिये फंड जुटाने के प्रस्ताव पर भी सावधानी भरा रवैया अपनाने की जरूरत है। सॉवरिन बॉन्ड बेचने से सरकार की देनदारियां उस समय और बढ़ जाएंगी जब रुपये की कीमत गिरेगी। पिछले पांच वर्षों में निर्यात स्थिर रहा है और अगर उसी तरह रहता है तो हमें फिर से भुगतान चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। आज निर्यात के खास उपकरणों एवं मध्यवर्ती उत्पादों के आयात पर भी निर्भर होने से आयात प्रतिस्थापन निर्यात प्रोत्साहन में सेंध लगा सकता है।

इतिहास से सीख

नरसिंह राव सरकार के पहले दो वर्षों में प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी तैनाती के दौरान मैं कई ऐसी बहसों का गवाह रहा जिनमें आयात प्रतिस्थापन एवं आत्म-निर्भरता की रणनीति को तिलांजलि देने का जिक्र होता था। देश के जाने-माने उद्योगपतियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्द्धा के लायक न होने से भारतीय उद्योग के खोखला हो जाने की चेतावनी दी थी। लेकिन वे गलत साबित हुए और भारत उच्च-वृद्धि पथ पर चल पड़ा। ऐसा साहसिक सुधारों और उदारीकरण के लिए उठाए गए कदमों से ही संभव हो सका। इससे भारतीय उद्योग अधिक प्रतिस्पर्द्धी ही बने और वे पहले से स्थापित अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों का भी सामना करने लायक बन सके। अगर अतीत के इन सबक को हम भूल जाते हैं और ‘स्वदेशी’ आवरण में चले जाते हैं तो वह दुखद होगा। यह तीव्र विकास दर नहीं धीमी दर का नुस्खा है। इससे न तो पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगी और न ही भारत की बड़ी भू-राजनीतिक अहमियत ही कायम रहेगी। भारत एक अग्रणी शक्ति के रूप में विस्तारित भू-राजनीतिक भूमिका नहीं निभा सकता है। वैश्वीकरण को तकनीक से ताकत मिलती है और हमारी प्राथमिकताओं से परे वह आगे बढ़ेगा। भविष्य उन देशों का ही होगा जो वैश्वीकरण वक्र से आगे रहेंगे और सभी आयामों में विलक्षणता हासिल करने पर जोर देंगे। लेकिन आम बजट में की गई कुछ घोषणाएं इन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती हैं।