नई सरकार की कार्यसूची

भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष वर्तमान चुनौतियाँ

वर्ष 2018-19 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर के 7.2 फीसदी रहने का पूर्वानुमान लगाया गया था, जो इस वर्ष की शुरुआत में घटकर सात फीसदी रह गया, जो वास्तव में 6.5 फीसदी हो सकता है। लेकिन प्रचंड बहुमत के साथ जीतकर सत्ता में आई सरकार के लिए जीडीपी का आंकड़ा बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। अब चुनावी जीत का उत्साह खत्म हो गया है और देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री का शोर थम गया है। वास्तविकता का सामना करने और अच्छे दिन तथा सबका विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए चुनौतियों से निपटने का समय आ गया है। आखिरकार कॉरपोरेट भारत जाग गया है और उसने माना है कि हम मंदी जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं और विकास का संकट है, जो समग्र अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर असर डाल रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में निवेश का अकाल रहा है और जो भी विकास देखा जा रहा है, वह ज्यादातर भारतीयों द्वारा खपत के कारण है। लेकिन अब उपभोक्ता मांग में गिरावट और सरकारी खर्चे में कमी के कारण चिंता की स्थिति पैदा हो गई है।

ऑटोमोबाइल बिक्री, रेल माल ढुलाई, पेट्रोलियम उत्पाद की खपत, घरेलू हवाई यातायात और आयात के आंकड़े खपत में मंदी का संकेत देते हैं, विशेष रूप से निजी खपत में। फिर भी जीएसटी संग्रह नियमित है और अगर कोई गिरावट है, तो वह मामूली है।

चुनौतियों से निपटने के उपाय

अब जबकि कुछ ही हफ्ते बाद इस सरकार का पहला बजट पेश होगा, वित्त मंत्री सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने और इसे रफ्तार देने के लिए उद्योग जगत के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर रही हैं। इससे पहले कि निर्मला सीतारमण अपना काम शुरू करतीं, निवेश व विकास तथा रोजगार व कौशल विकास पर दो अगल-अलग कैबिनेट कमेटियों का गठन धीमी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने तथा अधिक रोजगार पैदा करने के लिए किया गया है, जो अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में भी भूमिका निभाएंगी। हालांकि संख्याबल अधिक होने के बावजूद इस सरकार से किसी बड़े सुधार की संभावना नहीं है, इसके बजाय इसका ध्यान अपने पहले कार्यकाल के कामकाज को निरंतरता देने और जिन क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश है, वहां सुधार करने की तरफ होगा।

राजकोषीय समझदारी- व्यक्तिगत करदाताओं और कॉरपोरेट संस्थाओं, दोनों के लिए कर कटौती और रियायतों पर बहुत शोर मचा हुआ है। हालांकि कर दर में कटौती जैसे नीतिगत उपायों को छोड़कर, ताकि खर्च करने के लिए आम आदमी के हाथों में थोड़ा ज्यादा पैसे दिए जा सकें, बजट में बहुत गुंजाइश नहीं है। सार्वजनिक खर्च को बढ़ावा देने के लिए सरकार के खजाने में बहुत पैसा नहीं है, क्योंकि वित्त वर्ष 2019 में राजकोषीय घाटे ने जीडीपी के 3.4 फीसदी को छू लिया और राजस्व के मद में सरकार की प्राप्ति लक्ष्य से कम रही है।

सरकारी खर्च बढ़ाने के प्रयास से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। एक तरीका यह है कि रिजर्व बैंक के रिजर्व को कम कर बाजार में तरलता बढ़ाई जाए, जिसका अध्ययन बिमल जालान समिति कर रही है। सरकारी राजस्व को बढ़ावा देने का एक अन्य तरीका सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) का विनिवेश और राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों से लाभांश जैसे गैर-कर राजस्व को हासिल करना है।

ऐसा करना आसान नहीं है, लेकिन ये ऐसे कदम हैं, जिनसे बहुत सारी तात्कालिक चिंताओं का समाधान हो सकता है। खासकर विनिवेश बहुत फायदेमंद है, जिससे सरकार का रूपांतरण एक कार्यक्षमता वाली टीम के रूप में हो सकता है। एयर इंडिया के विनिवेश और भारतीय रेलवे के पूंजीकरण फायदेमंद कदम हो सकते हैं।

बैंकिंग क्षेत्र में सुधार- सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भारतीय बैंकिंग उद्योग का लगभग 75 फीसदी हिस्सा हैं और इस पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। खराब ऋणों के बढ़ते बोझ ने उनकी उधार देने की क्षमता पर असर डाला है, क्योंकि अलाभकारी परियोजनाओं को कर्ज देने के बाद उनकी अधिकांश पूंजी खत्म हो गई है। इसके अलावा कई बैंक तब तक उधार नहीं दे सकते, जब तक उनकी परिसंपत्ति की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता या एनपीए काफी कम नहीं हो जाता।

सरकार को तत्काल सार्वजनिक बैंकों में पूंजी डालने की जरूरत है, ताकि कॉरपोरेट लोन लेने के साथ आर्थिक पुनरुद्धार के लिए ऋण देना शुरू किया जा सके। सार्वजनिक उपक्रमों से संबद्ध एक उद्योग जो चुनौतियों का सामना कर रहा है, वे हैं एनबीएफसी यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां, जो तरलता के संकट का सामना कर रही हैं।

खासकर आईएल ऐंड एफएस जैसी बुनियादी ढांचा कंपनी और डीएचएफएल जैसी ऋणदाता कंपनी के डिफॉल्ट होने के बाद से, यह क्षेत्र कठिन स्थितियों का सामना कर रहा है। इस क्षेत्र में भी तत्काल तरलता की जरूरत है, अन्यथा कई ऑपरेशन निवेशकों की भावना को प्रभावित कर सकते हैं। चूंकि एनबीएफसीज छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए सबसे बड़े ऋणदाता हैं, इसलिए उनका अस्तित्व और मजबूती महत्वपूर्ण है।

जीएसटी का सरलीकरण- जीएसटी पर अब भी काम चल रहा है और इस बार सरकार के पास इस कर व्यवस्था को सुचारू बनाने का समय है। इस दिशा में पहला कदम जीएसटी फाइलिंग प्रक्रिया को सरल बनाना और कई कर ढांचे को कम करना होगा। जीएसटी को कुशल और आसान बनाकर सरकार असंगठित क्षेत्र के अधिक व्यवसायियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश करने और कर दायरे में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

अन्य मुद्दे – राज्य के स्वामित्व वाली सामान्य बीमा कंपनियों के विलय का मुद्दा लंबे समय से लंबित है। विलय से इन संस्थानों में दक्षता आएगी। प्रत्यक्ष कर संहिता पर फिर से विचार करके आयकर को सरल बनाने पर भी चर्चा हो रही है। ये ऐसे क्षेत्र हैं, जो अर्थव्यवस्था को फिर से गति दे सकते हैं और विकास में तेजी ला सकते हैं। सामूहिक कदम से देश में अधिक पारदर्शी और कर अनुपालन व्यवस्था सुनिश्चित होगी। ये सरकार के लिए कार्यसूची है, जिनमें से अधिकांश को अगर सरकार अपने कार्यकाल के पहले दो वर्षों में निपटाती है, तो न केवल सरकार का कामकाज सुचारू होगा, बल्कि इसका असर 2024 के चुनाव में भी दिखेगा।

साभार : नारायण कृष्णमूर्ति, अमर उजाला