ईरान में प्रदर्शन और भारत की चिंताएं

सन्दर्भ

बीते मंगलवार को एमनेस्टी इंटरनेशनल से मिली एक रिपोर्ट के अनुसार ईरान में अब तक दो सौ आठ प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। एमनेस्टी के एक अधिकारी के अनुसार इनमें से ज्यादातर मौतें पिछले एक सप्ताह में प्रदर्शनों को रोकने के लिए की गई सरकारी कार्रवाई के दौरान हुई हैं। ईरान में पिछले 15 नवंबर से वहां की सरकार द्वारा तेल की कीमतें बढ़ाए जाने के विरोध में जबर्दस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार इनसे निपटने के लिए पुलिस बल का सहारा ले रही है। उसने इंटरनेट पर भी पाबंदी लगा दी है। इसलिए देश के भीतर क्या हो रहा है, इसकी सही-सही जानकारी बाहर नहीं आ पा रही है। ईरान की संवाद समितियां आईआरआईबी और इरना पूरी तरह चुप हैं और वहां के अखबारों में इन प्रदर्शनों के बारे में खबरें नहीं छप रही हंै। लेकिन इधर-उधर से छन कर आ रही खबरों के अनुसार इन प्रदर्शनों ने वहां काफी उग्र रूप धारण कर लिया है। एमनेस्टी की रिपोर्ट इसका एक संकेत है। ईरान में इसकी भूमिका कैसे तैयार हुई, यह विस्तृत अध्ययन का विषय है, लेकिन असंतोष का तात्कालिक कारण र्इंधन के संबंध में लागू किए गए वहां की सरकार के नए नियम ही हैं।

असंतोष का तात्कालिक कारण

  • नए नियम के अनुसार अब प्रत्येक मोटर मालिक को प्रतिमाह सिर्फ साठ लीटर पेट्रोल पंद्रह हजार रियाल प्रति लीटर की दर से मिलेगा। अगर वह इससे अधिक पेट्रोल खरीदता है तो उसे प्रति लीटर तीस हजार रियाल का भुगतान करना होगा।
  • इससे पहले मोटर मालिकों को दस हजार रियाल प्रति लीटर की दर से एक माह में ढाई सौ लीटर पेट्रोल खरीदने की अनुमति थी।
  • जब तेल नियम में किए गए बदलावों के खिलाफ ये आंदोलन शुरू हुए तब ईरान सरकार के हवाले से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि नए नियम के तहत पेट्रोल पर लागू सब्सिडी हटाने से उसे जो धन प्राप्त होगा उससे देश के निम्न आयवर्ग के लोगों को नकद लाभ दिया जाएगा।
  • बताया गया था कि इससे सरकार को प्रतिवर्ष तीन सौ ट्रिलियन रियाल की आय होगी और इस धन से जल्दी ही करीब अठारह मिलियन परिवारों को अतिरिक्त नगद भत्ता देना शुरू कर दिया जाएगा।

अमेरिकी प्रतिबन्ध के कारणसब्सिडी में कटौती

  • सरकार द्वारा मुहैया सब्सिडी के कारण ईरान में शेष विश्व के मुकाबले तेल की कीमत सबसे कम है।
  • अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से ईरानी तेल निर्यात में बेहद गिरावट आई है और उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा गई है।
  • ऐसे में ईरान सरकार अपने घरेलू उपभोग पर सब्सिडी की कटौती कर रही है, ताकि कमजोर आयवर्ग के लोगों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं को वह जारी रख सके।
  • तेल की कीमतों में की गई इस वृद्धि के विरोध में शुरू हुए आंदोलन से कुछ ही दिन पहले भारत की महिला पत्रकारों का एक दल ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद जरीफ से मिला था। उनसे अपनी बातचीत में जरीफ ने इस बात की पुष्टि की थी कि अमेरिकी प्रतिबंध के कारण तेल से प्राप्त होने वाला राजस्व गिरा और मुद्रास्फीति बढ़ी है।
  • उन्होंने कहा कि लेकिन ईरान की अर्थव्यवस्था का आधार तेल है, इसलिए वह तेल बेचता रहेगा और बहुत से देश उससे तेल खरीदते भी रहेंगे। लेकिन उस व्यापार में भ्रष्टाचार पनपेगा और संभव है कि पारदर्शिता भी न रहे।
  • जरीफ ने कहा कि इन प्रतिबंधों के चलते बहुत से देशों ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया है।
  • हम समझते हैं कि कोई भी देश अमेरिका के खिलाफ जाकर अपना अहित नहीं करना चाहता, लेकिन उनके देश को इस बात से काफी तकलीफ हुई है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र और दुनिया में तेल के तीसरे नंबर के सबसे बड़े उपभोक्ता ने भी अमेरिका के आगे घुटने टेक दिए हैं और ईरान से तेल का आयात बंद कर दिया है।

ईरान एवं भारत

  • ईरान को लगता है कि भारत जैसे बड़े देश को अमेरिकी दादागीरी के सामने झुकना नहीं चाहिए था।
  • जरीफ ने कहा कि दरअसल, इससे दोनों देशों का अहित होगा। आप हमारा तेल नहीं खरीदेंगे तो हम आपका चावल, मसाले, चाय और अन्य रासायनिक उत्पाद नहीं खरीदेंगे। फिलहाल अपने परंपरागत सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्ते को शायद हम कुछ समय तक और बचाए रख सकें।
  • ईरान भारत का दूरस्थ पड़ोसी है और उसके साथ हमारा लंबा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता रहा है। इसके अलावा चार अन्य ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जिनमें ईरान के साथ भारत का गहरा संबंध रहा है।
  • उसमें पहला है ऊर्जा का क्षेत्र। कच्चे तेल और गैस के लिए यानी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए हम जिन चार-पांच मुख्य देशों पर निर्भर हैं, उनमें ईरान का दूसरा स्थान है। हमारी ऊर्जा की साठ प्रतिशत जरूरतें ईरान और इस क्षेत्र के अन्य देशों से पूरी होती हैं। ईरान हमें प्रतिदिन चार लाख पचीस हजार बैरल तेल की आपूर्ति करता रहा है और उसके बदले में भारत उसके तेल और गैस उद्योग में निवेश करने वाले देशों में शामिल हैं।
  • दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है कनेक्टिविटी यानी संपर्क या पारगमन सुविधा। ईरान के रास्ते हमें अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे कई मुल्कों तक व्यापार संपर्क बढ़ाने की सुविधा मिली है। अफगानिस्तान, खासतौर से चारों ओर से जमीन से घिरा हुआ देश है और पाकिस्तान के कारण हमारी उस तक पहुंच नहीं बन पाती, लेकिन ईरान के जरिए हम ऐसा कर सके हैं। ईरान स्थित चाबहार बंदरगाह के रास्ते हमारा व्यापार सिर्फ इन्हीं देशों तक नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के साथ भी संभव हो सका है। हालांकि अभी चाबहार बंदरगाह में भारत द्वारा निर्मित शहीद बहिश्ती टर्मिनल का परिचालन पूरी तरह शुरू नहीं हो सका है, लेकिन इसकी शुरुआत से सिर्फ नौ-दस माह में ही उसके जरिए हम दो लाख टन से ज्यादा कार्गो अन्य देशों तक भेज चुके हंै।
  • तीसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध, जिनकी शुरुआत 1950 से ही हो गई थी, हालांकि उस समय गुटनिरपेक्ष भारत सोवियत संघ के प्रभाव में था और ईरान अमेरिका के, लेकिन उनके बीच रिश्तों में कभी दरार नहीं आई। 1990 में दोनों ही देशों ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ नार्दर्न एलायंस की अशरफ गनी सरकार का समर्थन किया। विदेश नीति संबंधी इन मसलों पर जहां इन दोनों देशों का रवैया लगभग समान रहा, वहीं कुछ मामलों में उसमें विभेद भी रहा। भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम का जोरदार विरोध किया और अफगानिस्तान में जहां दोनों ने तालिबान का विरोध किया, वहीं भारत ने वहां नाटो बलों की मौजूदगी का समर्थन किया।
  • चौथा क्षेत्र है ईरान में सिख धर्म के अनुयाइयों की उपस्थिति। ईरान में 2011 की जनगणना के हिसाब से सिखों के साठ परिवार रहते हैं। ये लोग वहां भारत के विभाजन से भी पहले से रहते आए हैं। इन परिवारों को वहां की इस्लामी सरकार ने गुरद्वारा बनाने और अपना धर्म मानने की इजाजत दी है। इस साल श्रीगुरुनानक देव जी की साढ़े पांच सौवीं जयंती पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। ये सिख परिवार वहां मुख्य रूप से व्यवसाय करते हैं और उनके बच्चे वहां के भारतीय स्कूल में अन्य विषयों के साथ-साथ फारसी भाषा का भी अध्ययन करते हैं।

आगे की राह

 निश्चित रूप से भारत अपने व्यापारिक और अंतरराष्ट्रीय राजनयिक संबंधों को सिर्फ अमेरिकी चश्मे से नहीं देख सकता। हमें यह तो समझना ही होगा कि हम इसकी क्या कीमत चुका रहे हैं और इसकी भरपाई कैसे करेंगे। जहां तक ईरान के भीतर उग्र होते जा रहे प्रदर्शनों का संबंध है, अगर उसके पीछे भी कुछ विदेशी ताकतों का हाथ हो तो आश्चर्य नहीं। अफगानिस्तान, सीरिया जैसे देशों के घरेलू आंदोलनों को दूसरे देशों ने ही हवा दी थी।

साभार :जनसत्ता (सुजाता माथुर)