आसान नहीं यूनिवर्सल बेसिक इनकम की राह

संदर्भ:

छोटे और सीमांत किसानों को एक सुनिश्चित आय सहायता के रूप में देने के लिए अंतरिम बजट में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि बनाने की घोषणा की गई है। इस प्रकार भारत दुनिया का पहला देश है जो 12 करोड़ से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण की सुविधा उपलब्ध कराने जा रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों की सरकारों द्वारा इस तरह की योजनाओं के जरिये किसानों को उपलब्ध कराई गई सहायता राशि का अध्ययन करने पर पता चलता है कि भारत में यह रकम बहुत अधिक है। बहरहाल सरकार द्वारा प्रत्येक किसान के खातों में प्रति वर्ष 6,000 रुपये की राशि हस्तांतरित करने की घोषणा के साथ ही भारत में यूबीआइ (यूनिवर्सल बेसिक इनकम) यानी एक न्यूनतम और सुनिश्चित आमदनी की सार्थकता पर गंभीर विमर्श की जरूरत महसूस की जा रही है।

यूनिवर्सल बेसिक इनकम का इतिहास :

  • भारत में बेसिक इनकम को यूनिवर्सल बेसिक इनकम की संकल्पना से जोड़कर देखा जाता है, जिसका आगाज 18वीं शताब्दी में गरीबी दूर करने के लिए किया गया था।
  • इसे समाज में मौजूद असमानता को दूर करने वाले उपाय के रूप में भी देखा गया है। दुनिया भर में 18वीं शताब्दी को औद्योगीकरण का काल माना जाता है।
  • इस सदी में दुनिया भर में व्यापक स्तर पर कल-कारखानों की शुरुआत हुई। नतीजन पूंजीवाद की संकल्पना तेजी से विस्तार पाने लगी।
  • 2016-17 के आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट को 31 जनवरी 2017 में प्रकाशित किया गया जिसमें यूनिवर्सल बेसिक इनकम की संकल्पना पर 40 पन्नों में विस्तार से चर्चा की गई।
  • इसमें इसे गरीबी दूर करने और असमनाता कम करने के उपाय के रूप में देखा गया।

यूबीआइ की संकल्पना :

  • भारत में इस संकल्पना के तहत सभी नागरिकों को एक निश्चित राशि देने का प्रस्ताव किया गया है ताकि सभी देशवासी ठीक से अपना जीवनयापन कर सकें।
  • प्रणव कुमार वर्धन जैसे अर्थशास्त्रियों ने इस संकल्पना का समर्थन यह कह कर किया कि भारत जैसे भ्रष्ट और सामाजिक रूप से पिछड़े देश में सभी नागरिकों को उनके जीवनयापन के लिए एक निश्चित राशि दी जानी जरूरी है।

इस स्कीम के फायदे :

  • इसमें दो राय नहीं है कि खातों में नकद हस्तांतरण सशर्त या बिना शर्त परिवारों की आय बढ़ाता है। इस संकल्पना के समर्थकों का मानना है कि इस उपाय की मदद से व्यापक स्तर पर लोगों का कल्याण किया जा सकता है।
  • भारत में इसे लागू करना लोगों के कल्याण करने के मामले में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। साथ ही गरीबी दूर करने के मामले में भी यह मील का पत्थर साबित हो सकता है।
  • मौजूदा समय में देश में श्रमिकों की संख्या बल में महिलाओं की संख्या काफी कम है। देश में असंगठित क्षेत्र का एक व्यापक दायरा होने के कारण महिला श्रमिकों का शोषण हो रहा है, लेकिन खातों में नकद हस्तांतरण से उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बदल सकती है।
  • महिलाओं के आर्थिक रूप से सबल होने से लिंग अनुपात में भी समानता आएगी। वर्ष 2018 में घर से बाहर 75 प्रतिशत महिलाएं बेरोजगार थीं। इसलिए यूनिवर्सल बेसिक इनकम से महिला सशक्तीकरण को बल मिलेगा जिसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर पड़ सकता है।

असंगठित कामगारों को मदद :

  • वर्तमान में लगभग 90 प्रतिशत से अधिक कामगार असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिसमें 10 से कम संख्या में काम करने वाले श्रमिकों की बड़ी संख्या है। चूंकि फिलहाल 10 की संख्या से नीचे काम करने वाले कामगारों की गतिविधियों पर सरकार नजर नहीं रखती है, लिहाजा ऐसे श्रमिक भविष्य निधि में अपना योगदान नहीं कर पाते हैं और इन्हें पेंशन, बीमा और स्वास्थ्य से जुड़े फायदे नहीं मिल पाते हैं।
  • यूनिवर्सल बेसिक इनकम से ऐसे कामगारों को सीधे तौर पर लाभ मिल सकेगा। इस योजना की वजह से लोग बैंक से जुड़ने के लिए भी प्रेरित होंगे जिससे वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार करने में आसानी होगी।
  • साथ ही आम लोगों को बैंक से कर्ज भी मिल सकेगा जिससे मांग एवं आपूर्ति के प्रवाह में तेजी आएगी और विकास को बल मिलेगा।

दिल्ली व मध्य प्रदेश में अध्ययन :

  • भारतीय नीति-निर्माताओं ने यूनिवर्सल बेसिक इनकम के प्रभाव को समझने के लिए मध्य प्रदेश और दिल्ली में दो अध्ययन किया है।
  • पहला अध्ययन दिल्ली में ‘स्व-नियोजित महिला समिति’ के साथ मिलकर वर्ष 2011 में जनवरी से दिसंबर तक किया गया, जबकि मध्य प्रदेश सरकार ने सेवा के साथ मिलकर एक नियंत्रित अध्ययन किया।
  • इन दोनों अध्ययनों के तहत 100 परिवारों को हर महीने 1,000 रुपये दिए गए। परिणाम के तौर पर यह देखा गया कि लाभान्वित परिवार ने महिला सदस्य के नाम से बैंक में सहायता राशि को जमा करा दिया जिसका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर किया गया।
  • ‘स्व-नियोजित महिला समिति’ गरीबी व असमानता को कम करने वाली संस्था के रूप में लंबे समय से सक्रिय है।

कुछ देशों में इसका अध्ययन :

  • वर्ष 2015 में हाना क्रेंडलन और ओल्केन ने छह विकासशील देशों- होंडुरास, मोरक्को, मैक्सिको, फिलीपींस, इंडोनेशिया और निकारागुआ में श्रम की आपूर्ति पर सरकारी नकदी हस्तांतरण योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन किया था और अपने अध्ययन में उन्होंने नकद हस्तांतरण के प्रावधान से पुरुषों या महिलाओं की श्रम आपूर्ति में, चाहे वह घर में हो या बाहर, उसमें कोई उल्लेखनीय कमी नहीं पाई थी।
  • दुनिया भर में ऐसे कई देश हैं जिन्होंने इस तरह से जरूरतमंदों को वित्तीय सहायता देने की कोशिश की, लेकिन पाया कि इस तरह की योजना को चलाने से वैसे कारकों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है जिसकी वजह से असमानताएं बढ़ती हैं।
  • हालांकि इस योजना का सकारात्मक पक्ष यह है कि इसकी मदद से वंचित तबकों का आर्थिक एवं सामाजिक रूप से उन्नयन करने के साथ मौजूदा सब्सिडी या अन्य योजनाओं को लागू करने के दौरान बिचौलिये, भ्रष्टाचार आदि पर भी लगाम लगेगा जिससे सरकारी निधि के बंदरबांट की आशंका कम होगी। यानी इसके जरिये भ्रष्टाचार को भी कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

क्या है इस स्कीम का नुकसान :

  • इस स्कीम की संकल्पना के विरोधियों का मानना है कि मुफ्त पैसा लोगों को आलसी बनाता है और लाभार्थी काम करने से परहेज करने लगते हैं।
  • मुफ्त में पैसा मिलने से जो श्रमिक कार्य कर रहे हैं वे भी काम करने से परहेज करने लगेंगे जिससे श्रमिक आपूर्ति में कमी आ सकती है।
  • मुफ्त का पैसा मिलने से लोगों के बीच फिजूलखर्ची की आदत भी विकसित होने की आशंका जताई गई है।
  • घर के पुरुष सदस्यों में नशे और जुआ खेलने की प्रवृत्ति पनप सकती है, क्योंकि हमारे देश में अभी भी ज्यादा संख्या में पुरुष ही बैंक से जुड़े हुए हैं।
  • इस योजना को लागू करने से बैंकों पर काम का दबाव बढ़ेगा। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पहले से ही मानव संसाधन की कमी का सामना कर रहे हैं। यह पूरी व्यवस्था सही तरीके से कार्य कर सके इसके लिए देश में बैंकों की तकनीकी प्रणाली को अपडेट करने के लिए भारी-भरकम पूंजी की दरकार होगी।

जरूरतमंदों की पहचान मुश्किल :

  • इस स्कीम का एक दूसरा पहलू यह भी है कि वास्तविक जरूरतमंदों की पहचान करना सरकार के लिए मुश्किल कार्य होगा।
  • इस प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। अपात्र व्यक्ति भी इस योजना का लाभ लेने में सफल हो सकता है।
  • एक अनुमान के मुताबिक देश में मौजूदा लोक कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने की लागत सकल घरेलू उत्पाद का 3.7 प्रतिशत है, जबकि प्रस्तावित योजना की लागत जीडीपी का 0.9 प्रतिशत होने का अनुमान है।
  • ऐसे में लागत बढ़ने से पूंजी की व्यवस्था करना भारत जैसे विकासशील देश के लिए आसान नहीं होगा।

अर्थव्यवस्था पर असर की आशंका :

  • पड़ताल से साफ है इस योजना से फायदा और नुकसान दोनों होने की संभावना है।
  • भारत जैसे बड़े और विविधता से परिपूर्ण देश में इसे लागू कराना आसान नहीं है।
  • भारत में यूनिवर्सल बेसिक इनकम को लागू करने के लिए संसाधनों की व्यापक मात्रा में जरूरत होगी जिसके लिए मौजूदा सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आदि को बंद करना पड़ सकता है।
  • अगर ऐसा किया जाएगा तो लोगों के बीच अविश्वास का माहौल कायम होगा। समस्या लाभार्थियों की पहचान करने में भी होगी।
  • भारत में अशिक्षा और गरीबी का दायरा बहुत व्यापक है। देश में अनपढ़ लोगों की एक बड़ी फौज होने के कारण वे इस योजना से मिलने वाले लाभ को अपना अधिकार समझने लगेंगे जिससे देश के कार्यबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • सबसे बड़ा नुकसान श्रमिक बल में कमी आने से अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। काम-धंधों की रफ्तार कम होने से उत्पादों के निर्माण की गति धीमी होगी जिससे मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा होगा और इस कारण देश का विकास प्रभावित होने की आशंका रहेगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूबीआइ की स्थिति :

  • आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के अनुसार किसी भी देश ने बुनियादी आय को ‘कामकाजी उम्र’ के लोगों के लिए आय समर्थन का एक प्रमुख स्तंभ नहीं माना है। लेकिन कई देशों में कुल आबादी के एक छोटे से भाग पर इस संकल्पना को आजमाया गया है।
  • अमेरिका और ईरान का नाम इस संदर्भ में लिया जा सकता है। अमेरिका का ‘अलास्का स्थायी कोष’ एक निवेश कोष है जिसका निर्माण तेल राजस्व की मदद से किया गया है।
  • वर्ष 1982 से इस निधि से अलास्का के प्रत्येक व्यक्ति को वार्षिक लाभांश का नियमित तौर पर भुगतान किया जा रहा है।

कई देशों में शुरू करने की कवायद:

  • इसी तरह का एक प्रयोग वर्ष 2011 में ईरान में किया गया था जिसके तहत औसत दर्जे की घरेलू आय के 29 प्रतिशत जरूतमंद लोगों को प्रत्येक माह एक निर्धारित रकम का हस्तांतरण किया गया।
  • इसी तरह की योजना को लागू करने की घोषणा कनाडा, फिनलैंड और नीदरलैंड में भी की गई है। भारत, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड, नामीबिया, स्कॉटलैंड और जर्मनी में भी ऐसी योजना को लागू करने के लिए प्रयास किए जाते रहे हैं।