आम बजट और वृहद आर्थिक चुनौतियां

सन्दर्भ

गत माह मैंने अपने स्तंभ में इस बात को रेखांकित किया था कि देश के वृहद आर्थिक प्रदर्शन के लगभग सभी प्रमुख संकेतकों (वृद्धि, निवेश, रोजगार, मुद्रास्फीति, बाह्य संतुलन और राजकोषीय स्थिति) पर रुझान नकारात्मक ही हैं। मैंने सुझाव दिया था कि इन रुझानों को बदलने के लिए व्यापक नीति की आवश्यकता होगी। यह देखना सुखद है कि मैंने जो भी दिक्कतें बताई थीं और उनका जो उपचार सुझाया था, वह सरकार की ताजातरीन आर्थिक समीक्षा में नजर आ रहा है। खेद की बात है कि मैं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत बजट के बारे में वही बात नहीं कह सकता। अपनी बात को विस्तार देने के लिए मैं अपनी अनुशंसाओं के कुछ तत्त्वों पर चर्चा करूंगा। इनमें राजकोषीय नीति, व्यापार और विनिमय दर नीति तथा निवेश को बढ़ावा देने वाले सुधारों का जिक्र शामिल है।

राजकोषीय नीति

सकारात्मक बातों से शुरुआत करे तो, वित्त मंत्री को इस बात के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने बजट में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.3 फीसदी तक रखा। यह 2018-19 के 3.4 फीसदी के स्तर से मामूली कम है। ऐसा तब है जबकि उद्योग जगत और कुछ अर्थशास्त्री उच्च राजकोषीय प्रोत्साहन की मांग कर रहे थे। राज्यों और केंद्र का मिलाजुला घाटा जीडीपी के 7 फीसदी के बराबर है और सरकारी क्षेत्र की उधारी दर जीडीपी की 9 फीसदी है। ऐसे में वित्त मंत्री का यह मानना उचित प्रतीत होता है कि प्रोत्साहन की पहले ही कोई कमी नहीं है और उच्च राजकोषीय घाटे का जोखिम पहले ही निजी निवेश और जीडीपी तथा सरकारी ऋण के अनुपात की राह में बाधा बना हुआ है। यकीनन बजट के आंकड़ों पर अत्यधिक आशावाद के चलते सवाल उठाया जा सकता है, खासकर कर राजस्व (प्रमुखत: जीएसटी) में वृद्धि और विनिवेश प्राप्तियों तथा व्यय जरूरतों की कमजोर फंडिंग को देखते हुए।  बहरहाल, अगर अंतिम नतीजा जीडीपी के 3.5-3.6 फीसदी के बराबर भी रहता है तो भी इसे 2018-19 के 4 फीसदी की तुलना में बेहतर माना जाएगा। अगर 2018-19 के उलट बजट से इतर व्यय और ऋण की समस्या नहीं उपजी तो कोई समस्या नहीं होगी।

व्यापार एवं विनिमय दर नीति

वर्ष 2018-19 की अंतिम तिमाही में 5.8 फीसदी की वृद्धि दर दर्ज की गई। हर कोई चाहता है कि इसमें सुधार आए। आर्थिक समीक्षा में 2019-20 में वृद्धि दर के 7 फीसदी रहने की बात कही गई है। वित्त मंत्री 8 फीसदी का लक्ष्य लेकर चल रही हैं। कड़वी हकीकत यह है कि बिना निर्यात में तेजी लाए दुनिया का कोई भी बड़ा देश 7 फीसदी की स्थायी वृद्धि दर हासिल नहीं कर सकता। डॉलर के संदर्भ में हमारा वस्तु निर्यात बीते 6-7 वर्षों से स्थिर है। इस बीच जीडीपी में उसकी हिस्सेदारी 17 फीसदी से घटकर गत वर्ष 12 फीसदी रह गई है। यह ऐसे समय में हुआ है जब बांग्लादेश और वियतनाम का निर्यात बढ़ रहा है। इतनी खराब हालत के बावजूद वित्त मंत्री के भाषण में इसका सबसे नजदीकी संदर्भ भाग एक के आधे वाक्य में मिलता है जहां वह वैश्विक मूल्य शृंखला के भारत के लिए महत्त्व की बात करती हैं। भाग दो के पैरा 133 में उन्होंने सीमा शुल्क को लेकर जो प्रस्ताव रखे हैं, वे संरक्षणवादी हैं और वहां निर्यात का कोई उल्लेख तक नहीं है।

वास्तव में यह बजट खेदजनक ढंग से 2018 के अरुण जेटली के बजट को नजीर मानकर चलता है। इसने सीमा शुल्क में कमी की चौथाई सदी की परंपरा को उलट दिया है। मौजूदा वित्त मंत्री ने बजट में कुछ रसायनों, प्लास्टिक, कागज के उत्पादों, सिरैमिक, स्टील एवं अन्य धातुओं, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और वाहन कलपुर्जों पर भी शुल्क बढ़ाया है। ऐसा लगता है कि मंत्री और अधिकारी 70 वर्षों में सुस्थापित व्यापार एवं विकास के सबकों से कुछ नहीं सीख रहे। ये सबक बताते हैं कि उच्च सीमा शुल्क निर्यात को प्रभावित करता है और घरेलू उद्योग जगत की प्रतिस्पर्धा और किफायत को नुकसान पहुंचाता है। अगर आयात शुल्क में इस तरह घट-बढ़ होगी तो हम वैश्विक मूल्य शृंखला का हिस्सा कैसे बनेंगे?

निर्यात और आयात प्रतिस्पर्धी घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रुपये का अवमूल्यन एक अच्छा उपाय है। ध्यान रहे कि सन 1992-2010 के बीच जब सरकार और रिजर्व बैंक ने रुपये के अधिमूल्यन पर निगाह रखी तब हमारा निर्यात भी बढ़ा और औद्योगिक विस्तार भी हुआ। इस बजट में एक अहम प्रस्ताव यह भी है कि सरकार ऐसे सॉवरिन बॉन्ड जारी करे जो विदेशी मुद्रा में हों। इससे फंड को केंद्र के बजट घाटे की फंडिंग करने में सहायता मिलेगी। तमाम विकासशील देशों का अनुभव बताता है कि इससे बाहरी अनिश्चितताओं को लेकर हमारी संवेदनशीलता बढ़ेगी और हमारी आर्थिक संप्रभुता प्रभावित होगी।

यही कारण है कि इससे पहले बीते तीन दशकों के दौरान हमेशा वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को नकार दिया था। एक अन्य बात यह है कि ऐसी बाह्य उधारी रुपये को और मजबूत कर सकती है। इसका असर निर्यात और आयात प्रतिस्पर्धी घरेलू उत्पादन पर पड़ेगा। यह विडंबना ही है कि स्वदेशी सरकार विदेशी उधारी को लेकर इतनी तत्पर है।

निवेश समर्थक सुधार

राजकोषीय प्रोत्साहन की सीमित गुंजाइश को देखते हुए और राजकोषीय दबदबे तथा विभिन्न कंपनियों और बैंकों तथा गैर बैंकिंग कंपनियों में बैलेंस शीट तनाव के मौजूदा संदर्भ में विस्तारवादी मौद्रिक नीति की कमजोरी के मद्देनजर मैंने गत माह कहा था कि उच्च विदेशी निवेश और वृद्धि हासिल करने के लिए आर्थिक सुधार आवश्यक हैं। इसमें श्रम कानून सुधार और नियमन आवश्यक हैं ताकि संगठित क्षेत्र में रोजगार को प्रोत्साहन दिया जा सके। मैंने गैर कृषि उपयोग के लिए भूमि अधिग्रहण आसान बनाने और कृषि विपणन सुधारों को अंजाम देने की बात भी कही थी। इसमें अनाज की महंगी और विसंगतिपूर्ण खरीद की प्रक्रिया में सुधार भी शामिल है।

दुर्भाग्यवश बजट में ऐसा कोई बड़ा सुधार घोषित नहीं किया गया। हां, कुछ छोटे-मोटे सुधार अवश्य प्रस्तावित हैं लेकिन इनसे कारोबारी जगत में उत्साह की भावना आती हुई नहीं दिखती। जबकि निजी निवेश और वृद्धि के लिए यह उत्साह बहुत आवश्यक है। सन 2024 तक 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था और 8 फीसदी की औसत विकास दर का लक्ष्य तय करना अच्छी बात है लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत और सही नीतियों के क्रियान्वयन की आवश्यकता है। बिना इन कदमों के वृद्धि मौजूदा 6 फीसदी के असंतोष स्तर के आसपास रहेगी। ऐसे में बड़ी तादाद में जरूरी रोजगार तैयार होना मुश्किल है। दुर्भाग्य की बात है कि बजट इस दिशा में कुछ खास नहीं करता दिखता।